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जस्टिस शेखर यादव: अपने बयान पर कायम, न्यायिक मूल्यों के उल्लंघन से इनकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ने विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में दिए अपने बयान को लेकर चल रहे विवाद पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि वह अपने बयान पर कायम हैं। उन्होंने इस मामले में किसी भी न्यायिक सिद्धांत का उल्लंघन होने से इनकार किया है।

मुख्य मुद्दे:

  1. कार्यक्रम में बयान:
    • जस्टिस यादव ने समान नागरिक संहिता (UCC) को हिंदू बनाम मुस्लिम बहस के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा था कि हिंदू पक्ष ने अपनी प्रथाओं की कमियों को दूर कर लिया है, जबकि मुस्लिम पक्ष ने ऐसा नहीं किया।
    • उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ और बहुविवाह जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए।
  2. शिकायतें:
    • उनके बयान के खिलाफ एक लॉ स्टूडेंट और रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी द्वारा शिकायतें दर्ज की गई थीं।
    • इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर जवाब मांगा।
  3. जस्टिस यादव का जवाब:
    • उन्होंने कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है।
    • उन्होंने अपने विचारों को संविधान और न्यायिक मूल्यों के अनुरूप बताया।
    • उन्होंने कहा कि न्यायिक सदस्य होने के कारण वे सार्वजनिक रूप से अपना बचाव नहीं कर सकते, इसलिए वरिष्ठों का संरक्षण मिलना चाहिए।
  4. गौरक्षा पर रुख:
    • जस्टिस यादव ने अपने गौरक्षा संबंधी आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि यह भारतीय समाज और संस्कृति का हिस्सा है।
    • उन्होंने इसे निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं माना।

आलोचना और समर्थन:

जस्टिस यादव के बयान पर व्यापक विवाद हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यह बयान न्यायिक तटस्थता के खिलाफ है और किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाता है। वहीं, उनके समर्थक इसे सामाजिक सुधारों और भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मानते हैं।

न्यायिक प्रक्रिया:

सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए रिपोर्ट और जवाब मांगा है। अब देखना होगा कि यह मामला न्यायपालिका के भीतर कैसे आगे बढ़ता है।

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जस्टिस यादव का रुख इस विवाद में स्पष्ट है कि वह अपने बयान को सही मानते हैं। हालांकि, यह मामला न्यायपालिका की निष्पक्षता और न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियों पर नियंत्रण के बड़े सवाल उठाता है।

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