अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने 2002 के गोधरा दंगों से जुड़े एक मामले में सभी छह आरोपियों को बरी कर दिया है। यह मामला प्रांतिज इलाके में तीन ब्रिटिश नागरिकों समेत चार लोगों की हत्या से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपियों की पहचान के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और जांच की शुरुआत भी एक गुमनाम फैक्स मैसेज से हुई थी।
सेशन कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट की मंजूरी
इससे पहले 2015 में साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर की एक विशेष अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नौ प्रमुख दंगा मामलों की तेजी से जांच के लिए इस विशेष अदालत का गठन किया गया था। पीड़ित पक्ष की अपील पर हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की और 6 मार्च को अपना फैसला सुनाया, जिसे हाल ही में सार्वजनिक किया गया।
81 गवाहों की गवाही और जांच पर सवाल
हाईकोर्ट की जस्टिस एवाई कोगजे और जस्टिस समीर जे डेव की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि जांच में कई खामियां थीं। 81 गवाहों की गवाही को ध्यान में रखने के बावजूद आरोपियों की सही ढंग से पहचान नहीं की गई।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपियों की पहचान के लिए न तो ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (TIP) कराई गई और न ही ‘डॉक आइडेंटिफिकेशन’ समय पर की गई। डॉक आइडेंटिफिकेशन, जिसमें गवाह कोर्ट में आरोपी को पहचानते हैं, इस मामले में छह साल बाद हुई, जो पर्याप्त साक्ष्य नहीं मानी जा सकती।

इस मामले में जांच की शुरुआत 24 मार्च, 2002 को ब्रिटिश उच्चायोग को भेजे गए एक गुमनाम फैक्स से हुई थी, जिसमें आरोपियों के नाम बताए गए थे। अदालत ने कहा कि स्वतंत्र गवाहों के बयान के बजाय एक गुमनाम फैक्स के आधार पर जांच शुरू की गई, जिससे मामले की प्रमाणिकता पर सवाल उठते हैं।
क्या था पूरा मामला?
घटना 28 फरवरी, 2002 की है, जब ब्रिटिश नागरिक इमरान दाऊद अपने दो चाचा सईद सफीक दाऊद और सकील अब्दुल दाऊद के साथ अपने गांव के मोहम्मद असवार और ड्राइवर यूसुफ के साथ कार से लौट रहे थे।
शाम करीब 6 बजे हाईवे पर लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से लैस भीड़ ने उनकी गाड़ी रोक ली और उन पर हमला कर दिया। ड्राइवर यूसुफ की मौके पर ही मौत हो गई और भीड़ ने उनकी जीप को आग के हवाले कर दिया। मोहम्मद असवार गंभीर रूप से घायल हुए और अस्पताल में दम तोड़ दिया, जबकि सईद और सकील खेतों की ओर भाग गए, जिनका आज तक कोई पता नहीं चला।
आरोपियों को बरी करने का कारण
हाईकोर्ट ने माना कि आरोपियों की पहचान करने में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। शिकायतकर्ता इमरान दाऊद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आरोपी को भीड़ का हिस्सा बताया, लेकिन यह पहचान पर्याप्त प्रमाण नहीं मानी गई।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती फैसलों और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 9 के तहत, डॉक आइडेंटिफिकेशन को तभी सटीक साक्ष्य माना जाता है जब यह सही प्रक्रिया के तहत हो।
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गुजरात हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर गोधरा दंगों से जुड़े मामलों की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपियों को बरी कर दिया है, लेकिन इस फैसले से पीड़ितों के परिजनों में निराशा का माहौल है।