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अखिलेश यादव और अनिरुद्धाचार्य के पुराने वीडियो पर सियासत गरम, सपा सांसद प्रिया सरोज की टिप्पणी से बढ़ा मामला

करीब ढाई साल पुराना एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और प्रसिद्ध कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज के बीच तीखी वैचारिक बहस होती नजर आ रही है। इस पुराने संवाद को लेकर नई सियासी हलचल शुरू हो गई है। बहस की आग को और हवा तब मिली जब जौनपुर की मछलीशहर लोकसभा सीट से सपा सांसद प्रिया सरोज ने कथावाचक पर सीधा निशाना साधते हुए एक्स (पूर्व ट्विटर) पर विवादित टिप्पणी कर दी।

प्रिया सरोज ने अनिरुद्धाचार्य की एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा,
“जब कोई बाबा कृष्ण जी का नाम तक नहीं बता पाते तब अपनी छवि सुधारने के लिए सपा प्रमुख के बयान को हिंदू-मुस्लिम रंग देकर देश-प्रदेश का माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। क्या उनके प्रवचनों में यही सिखाया जाता है?”

उनकी इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। कई लोगों ने इसे सच्चाई की आवाज बताया तो कुछ ने इसे संतों के अपमान की संज्ञा दी। वहीं कुछ लोगों ने इसे धर्म और राजनीति के खतरनाक मिलन की शुरुआत बताया है।

क्या था पूरा मामला?

वायरल हो रहा यह वीडियो वर्ष 2023 लोकसभा चुनाव के दौरान आगरा एक्सप्रेसवे पर हुआ था, जब अखिलेश यादव और कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज की अनौपचारिक मुलाकात के दौरान चर्चा में बहस छिड़ गई थी। वीडियो में अखिलेश यादव कथावाचक से सवाल करते हैं,
“भगवान श्रीकृष्ण का सबसे पहला नाम क्या था?”
इस पर कथावाचक जवाब देते हैं – “वासुदेव नंदन”।
फिर अखिलेश दोबारा पूछते हैं – “जब उनकी मां ने जन्म दिया, तब उन्होंने क्या नाम रखा?”

अनिरुद्धाचार्य कहते हैं – “उनके अनेक नाम हैं।”
इसके बाद कथावाचक द्वारा वर्ण व्यवस्था का उल्लेख करते हुए समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में बांटा गया। इस पर अखिलेश यादव ने आपत्ति जताई और कहा –
“आइंदा किसी को शूद्र मत कहना। अब हमारा और आपका रास्ता यहीं से अलग होता है।”

अनिरुद्धाचार्य की प्रतिक्रिया और तंज

वीडियो वायरल होने के बाद अनिरुद्धाचार्य महाराज की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा –
“जब मैंने सच कहा तो उन्होंने कह दिया कि रास्ता अलग है। लेकिन क्या वो मुसलमानों से ऐसा ही कहते हैं? नहीं, वो कहते हैं कि तुम्हारा रास्ता ही हमारा रास्ता है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि राजनेता धर्म के आधार पर भेदभाव करते हैं, और ऐसे में देश का भला कैसे होगा?

प्रिया सरोज की एंट्री और नया विवाद

इस मुद्दे को और बड़ा बना दिया सपा सांसद प्रिया सरोज ने, जिन्होंने साफ तौर पर अनिरुद्धाचार्य पर निशाना साधते हुए धर्म मंचों से समाज में विभाजन फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा –
“धर्म की आड़ में राजनीति करना, समाज को बांटना, लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। ऐसे प्रवचन क्या समाज को जोड़ते हैं या तोड़ते हैं, यह जनता खुद तय करेगी।”

उनकी इस पोस्ट के बाद यह पूरा मामला और ज्यादा गरमा गया है। कुछ लोगों ने सांसद के समर्थन में प्रतिक्रिया दी, तो कुछ ने इसे संत समाज का अपमान बताया।

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ढाई साल पुराना यह वीडियो अब सियासी हथियार बन गया है। इसमें न केवल धर्म बनाम राजनीति की झलक दिखती है, बल्कि यह भी साफ हो गया है कि सामाजिक ताना-बाना किस तरह राजनीतिक बयानों और धार्मिक प्रवचनों की भेंट चढ़ सकता है।

भले ही यह वीडियो पुराना है, लेकिन इसके वायरल होते ही जिस तरह से राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।

(नोट: वायरल वीडियो की पुष्टि WPT News24 स्वतंत्र रूप से नहीं करता है।)

चुरहट में जन अधिकार आंदोलन: बारिश भी नहीं रोक पाई जनता की हुंकार, अजय सिंह बोले – “अब अन्याय नहीं सहेंगे”

मध्यप्रदेश के सीधी जिले के चुरहट विधानसभा क्षेत्र में मंगलवार को जन अधिकार आंदोलन के तहत कांग्रेस ने जोरदार प्रदर्शन किया। भारी बारिश के बावजूद हजारों की संख्या में ग्रामीणों, कार्यकर्ताओं और महिलाओं की मौजूदगी ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ जनता के आक्रोश को स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस आंदोलन का नेतृत्व पूर्व नेता प्रतिपक्ष और चुरहट विधायक अजय सिंह ‘राहुल भैया’ ने किया।

चुरहट ब्लॉक कांग्रेस और रामपुर ब्लॉक कांग्रेस के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस धरना-प्रदर्शन में कांग्रेस जिलाध्यक्ष ज्ञान सिंह, वरिष्ठ नेता जगत बहादुर सिंह, रूप शाह बैगा, राजकुमार सिंह सहित कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता उपस्थित रहे। आंदोलन में क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं को लेकर कलेक्टर सीधी के नाम 16 सूत्रीय ज्ञापन सौंपा गया और शीघ्र निराकरण की मांग की गई।

जनता के मुद्दों पर उठी एकजुट आवाज

ज्ञापन में मुख्य रूप से बिजली संकट, बाणसागर और गुलाब सागर परियोजनाओं से विस्थापन, खाद-बीज की कमी, प्रधानमंत्री आवास योजना में पारदर्शिता, मध्यान भोजन की गड़बड़ियां, राशन वितरण में सुधार, बीपीएल सूची में नाम जोड़ना और हटाए गए नामों को पुनः जोड़ना, आवारा पशुओं से किसानों की परेशानी, पेयजल संकट और आदिवासी भूमि पर हो रहे अवैध कब्जों जैसे मुद्दों को प्रमुखता से रखा गया।

विधायक अजय सिंह ने अपने संबोधन में कहा, “प्रदेश में बैठी भाजपा सरकार पूरी तरह भ्रष्ट और असंवेदनशील हो चुकी है। चुरहट की जनता वर्षों से बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है, लेकिन सरकार और प्रशासन नींद में हैं। अगर हमारी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो अगला आंदोलन और भी व्यापक और उग्र होगा।”

राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप

अजय सिंह ने प्रशासन पर भाजपा नेताओं के इशारे पर काम करने का आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस समर्थकों और कार्यकर्ताओं को टारगेट किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि “अगर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने की प्रवृत्ति नहीं रोकी गई, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। लोकतंत्र में प्रतिशोध की राजनीति को जनता कभी स्वीकार नहीं करती। कांग्रेस की सरकार ने कभी भेदभाव नहीं किया, लेकिन आज हालात इसके उलट हैं।”

उन्होंने साफ तौर पर प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर ज्ञापन में उल्लिखित मांगों का शीघ्र और संतोषजनक समाधान नहीं होता, तो आंदोलन की अगली कड़ी और बड़ी होगी। “यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जनता की है और हम इसे आखिरी दम तक लड़ेंगे,” उन्होंने कहा।

बरसात में भी दिखा जनसमर्थन

गत दिनों से जिले में मूसलधार बारिश जारी है। इसके चलते सोशल मीडिया पर यह आशंका जताई जा रही थी कि आंदोलन में भीड़ नहीं जुटेगी। लेकिन मंगलवार को भारी बरसात के बावजूद चुरहट में हजारों लोग अजय सिंह के समर्थन में सड़कों पर उतर आए। इससे यह स्पष्ट हो गया कि चुरहट की जनता अपने विधायक के साथ खड़ी है और अपने अधिकारों की लड़ाई में पीछे हटने वाली नहीं है

जन आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल रहीं, जो क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, पानी की कमी और बच्चों की शिक्षा से जुड़ी समस्याओं को लेकर बेहद आक्रोशित दिखीं।

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इस जन आंदोलन ने सरकार को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि चुरहट की जनता अब चुप नहीं बैठेगी। चाहे बारिश हो या राजनीतिक दबाव, जनता अपने हक की लड़ाई लड़ेगी और उसके लिए अजय सिंह ‘राहुल भैया’ जैसे नेता उनके साथ मजबूती से खड़े हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस चेतावनी को कितना गंभीरता से लेता है और समस्याओं के समाधान की दिशा में कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं।

भोपाल में बारिश से धंसी सड़क, कांग्रेस ने सरकार को घेरा – ‘ये गड्ढा नहीं, भ्रष्ट तंत्र की तस्वीर है

राजधानी भोपाल में गुरुवार को हुई तेज बारिश ने एक बार फिर नगर निगम और पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एमपी नगर इलाके में अचानक सड़क धंस गई, जिससे करीब 10 फीट गहरा और 8 फीट चौड़ा गड्ढा बन गया। गनीमत रही कि हादसे के वक्त सड़क पर कोई वाहन या राहगीर मौजूद नहीं था, अन्यथा बड़ा जानमाल का नुकसान हो सकता था। घटना के बाद कांग्रेस ने इसे भ्रष्टाचार का नतीजा बताते हुए प्रदेश सरकार पर तीखा हमला बोला है।

जीतू पटवारी का तंज – “ये गड्ढा डबल इंजन सरकार की नींव है”

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने घटनास्थल का वीडियो शेयर करते हुए प्रदेश सरकार और पीडब्ल्यूडी पर सीधा हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा,

“भोपाल में आपकी #PWD ने फिर ‘गौरवपथ’ से रूबरू करवा दिया है। ये गड्ढा नहीं, विकास की खोखली नींव है।”

उन्होंने आगे कहा कि यह केवल सड़क नहीं, बल्कि शासन की असफलता और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक है। पटवारी ने आरोप लगाया कि नगर निगम और लोक निर्माण विभाग ने जानबूझकर घटिया सामग्री का उपयोग किया, जिससे यह दुर्घटना घटी।

मौके पर कांग्रेस का प्रदर्शन, नेता उतरे गड्ढे में

सड़क धंसने की सूचना पर कांग्रेस नेता मनोज शुक्ला मौके पर पहुंचे और विरोध प्रदर्शन किया। वे खुद गड्ढे में उतर गए और इसे भ्रष्टाचार का गड्ढा बताते हुए शासन को आड़े हाथों लिया। इस दौरान स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उन्हें फूल-मालाएं भी पहनाईं, जो विरोध का प्रतीक बन गया।

अधिकारी हरकत में, रातभर चला मरम्मत कार्य

घटना की जानकारी मिलते ही एसडीएम एलके खरे और पीडब्ल्यूडी डिवीजन-2 के ईई एचएस जायसवाल मौके पर पहुंचे। सड़क के धंसे हिस्से की बैरिकेडिंग की गई और सीमेंट कंक्रीट स्लैब डालकर गड्ढा भरने का काम रात में ही शुरू कर दिया गया। अधिकारियों ने माना कि क्षेत्र की पुरानी नालियों और फुटपाथ की मरम्मत न होने की वजह से यह समस्या आई।

पुरानी नाली और स्लैब बना वजह

प्रशासनिक जांच में सामने आया कि मल्टीलेवल पार्किंग के पास बने नाले को तो नए सीसी डक्ट से जोड़ा गया, लेकिन आसपास की पुरानी नालियों को इससे नहीं जोड़ा गया। इसके चलते पानी रिसकर मिट्टी बह गई और सड़क बैठ गई। अधिकारियों ने माना कि फुटपाथ भी काफी पुराना है और नाले की दीवारें पत्थर की बनी हुई हैं, जिससे पानी रिसाव अधिक हुआ।

विपक्ष और सरकार के बीच सोशल मीडिया पर तीखी नोकझोंक

घटना के बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह के बीच भी ट्वीट-रिट्वीट की जंग छिड़ गई। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए सड़क निर्माण की गुणवत्ता को लेकर सोशल मीडिया पर तीखा वार-पलटवार किया।

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इस घटना ने राजधानी जैसे शहर में बुनियादी ढांचे की खस्ताहाली और जवाबदेही की कमी को उजागर कर दिया है। जहां सरकार विकास के दावे करती है, वहीं जरा सी बारिश में सड़कों का धंसना नागरिक सुरक्षा और निर्माण गुणवत्ता दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह है कि सरकार इस पर कितनी संवेदनशीलता से कार्रवाई करती है।

विश्व आदिवासी दिवस पर सार्वजनिक अवकाश की मांग तेज, कांग्रेस ने सौंपा राज्यपाल के नाम ज्ञापन

विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग को लेकर कांग्रेस पार्टी ने फिर मोर्चा खोल दिया है। सोमवार को भारतीय राष्ट्रीय आदिवासी कांग्रेस और मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्देश पर सिंगरौली में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने राज्यपाल के नाम जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस ने इस मौके पर आदिवासी समुदाय के सम्मान, गौरव और संवैधानिक अधिकारों को लेकर कई अहम मुद्दे उठाए।

कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में सौंपा गया ज्ञापन

कार्यक्रम का आयोजन आदिवासी कांग्रेस जिलाध्यक्ष विजय प्रताप सिंह की अध्यक्षता में किया गया। इस मौके पर प्रदेश महासचिव तिलकराज सिंह और वी. उड़के भी मौजूद रहे। ज्ञापन में स्पष्ट मांग की गई कि 9 अगस्त को पुनः सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाए, जिसे 2021 में शिवराज सरकार द्वारा हटाकर वैकल्पिक अवकाश में परिवर्तित कर दिया गया था।

आदिवासी गौरव और अधिकारों की मांग

ज्ञापन के माध्यम से कांग्रेस ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस न सिर्फ एक प्रतीकात्मक दिवस है, बल्कि यह आदिवासी समुदाय की पहचान, अधिकारों और सम्मान का दिन है। पार्टी ने यह भी कहा कि यदि इस दिन को सार्वजनिक अवकाश घोषित नहीं किया गया, तो यह आदिवासी समाज के साथ अन्याय होगा।

कांग्रेस नेताओं ने यह भी बताया कि पार्टी की योजना है कि अगस्त महीने में आदिवासी कांग्रेस द्वारा प्रशिक्षण शिविर, लंबित वन अधिकार अधिनियम और सामुदायिक वन पट्टों जैसे मुद्दों पर भी जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा।

2019 से चल रही है मांग, अब तक नहीं मिली मंजूरी

मध्यप्रदेश में 2019 में कांग्रेस सरकार ने पहली बार विश्व आदिवासी दिवस को स्थानीय अवकाश घोषित किया था। लेकिन 2021 में भाजपा सरकार ने इसे हटाकर वैकल्पिक अवकाश बना दिया। इसके बाद से लगातार कांग्रेस और आदिवासी समाज इसे पुनः सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग कर रहे हैं।

साल 2024 में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस विषय में ध्यान देने की मांग की थी। कांग्रेस का कहना है कि चार वर्षों से लगातार इस मुद्दे पर पार्टी अडिग है और आदिवासी समाज के साथ मिलकर इसे लेकर आंदोलन करती रहेगी।

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ज्ञापन सौंपने के दौरान सुष्मिता सिंह, जगत बहादुर सिंह, रमेश पनिका, ललन सिंह, रूप शाह बैगा, मनीष कुमार बियार, इंद्रभान सिंह, चंद्र प्रताप सिंह, लोलर सिंह, राजकुमार सिंह, वीरेंद्र कुमार सिंह मरकाम, दयाराम पनिका और तेज नारायण वैश्य सहित कई नेता और कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

मध्यप्रदेश में मूसलधार बारिश से जनजीवन प्रभावित, बाणसागर डैम के 8 गेट चौथी बार खुले, कई जिलों में स्कूल बंद

मध्यप्रदेश के कई जिलों में जारी मूसलधार बारिश ने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। लगातार हो रही बारिश के कारण बांधों का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है, वहीं निचले इलाकों में बाढ़ जैसे हालात बनने लगे हैं। सबसे गंभीर स्थिति बाणसागर डैम की है, जहां जलस्तर बढ़ने के चलते चौथी बार 8 गेट खोलने पड़े हैं। प्रशासन अलर्ट मोड पर है और लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।

बाणसागर डैम में खतरे का स्तर पार, निचले इलाकों में अलर्ट

सूत्रों के अनुसार, बाणसागर डैम में 81.27% जलभराव हो चुका है। भारी बारिश की वजह से डैम में लगातार पानी की आवक बनी हुई है। स्थिति को देखते हुए 2 मीटर तक डैम के 8 गेट चौथी बार खोले गए हैं ताकि अतिरिक्त पानी को निकाला जा सके।

बाणसागर में वर्तमान में 1019 क्यूसेक पानी का आगमन हो रहा है, जबकि 3191 क्यूसेक की निकासी की जा रही है। स्पिलवे गेट से 3080 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है ताकि जलस्तर नियंत्रित रहे। प्रशासन ने डैम के निचले इलाकों में अलर्ट जारी करते हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी है।

स्कूलों में अवकाश, कस्बों में जलभराव, थाना परिसर तक पानी

डिंडौरी जिले में स्थिति गंभीर बनी हुई है। अतिवृष्टि के चलते कलेक्टर नेहा मारव्या ने सभी सरकारी स्कूलों में अवकाश घोषित किया है। इसी तरह मऊगंज जिले में भी सभी स्कूलों में आज छुट्टी घोषित कर दी गई है।

नईगढ़ी कस्बे की स्थिति बेहद चिंताजनक है जहां कई घरों में घुटनों तक पानी भर गया है। लोग जरूरी सामान लेकर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। यहां तक कि स्थानीय थाना परिसर भी जलमग्न हो गया है।

पीथमपुर में हादसा, दीवार गिरी

पीथमपुर में बारिश का एक और खतरनाक रूप सामने आया है। यहां एक निर्माणाधीन तीन मंजिला मकान की दीवार गिर गई। हालांकि राहत की बात यह रही कि हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई। फिर भी इसने प्रशासन को सतर्क कर दिया है कि पुराने व अधूरे निर्माणों पर नजर रखी जाए।

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प्रशासन की तैयारियां और सतर्कता

प्रशासन ने जलभराव वाले क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी हैस्थानीय पुलिस, नगर पालिकाएं और राजस्व विभाग की टीमें स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। बाणसागर प्रबंधन और जिला प्रशासन ने नागरिकों को हिदायत दी है कि वे जलभराव और निचले इलाकों से दूर रहें और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत हेल्पलाइन नंबरों पर संपर्क करें

क्या आगे और बिगड़ सकती है स्थिति?

मौसम विभाग ने अगले 48 घंटे भारी बारिश की संभावना जताई है, जिससे हालात और गंभीर हो सकते हैं। नदियों का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ का खतरा कई जिलों में बना हुआ है। प्रशासनिक अमला फिलहाल पूरी तरह से चौकस और मुस्तैद है।

विधायक की जुबान पड़ गई भारी: दरोगा पाठक पर अभद्र टिप्पणी मामले में एमपीएमएलए कोर्ट ने दर्ज किया परिवाद,

देवसर विधानसभा से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक राजेन्द्र मेश्राम अब कानूनी पचड़े में फंसते नजर आ रहे हैं। करीब एक साल पुराने मामले में विधायक द्वारा सार्वजनिक सभा के दौरान पंचायत प्रतिनिधि पर की गई कथित अमर्यादित टिप्पणी को लेकर एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट जबलपुर में मानहानि का परिवाद दर्ज हो गया है। न्यायालय ने विधायक को 4 अगस्त 2025 को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जमानत प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।

क्या है मामला?

मामला 18 जून 2024 का है, जब ग्राम पंचायत गोडवहरा (देवसर) में एक जनसभा आयोजित की गई थी। इस दौरान मौजूद बंधा सरपंच देवेंद्र कुमार पाठक उर्फ दरोगा पाठक पर विधायक राजेंद्र मेश्राम ने कथित तौर पर ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले थे। घटना से आहत होकर सरपंच दरोगा पाठक ने मामले को अदालत की चौखट तक पहुंचाया।

विशेष अदालत में दर्ज हुआ परिवाद

सरपंच की ओर से अधिवक्ता रामनरेश द्विवेदी (देवसर) द्वारा एमपीएमएलए विशेष न्यायालय जबलपुर में मामला प्रस्तुत किया गया। न्यायाधीश डी.पी. सूत्रकार की अदालत ने 11 जुलाई 2025 को मामला दर्ज करते हुए इसे भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 356(2) के अंतर्गत स्वीकार कर लिया है। इस धारा के तहत अगर आरोप सिद्ध होता है तो अधिकतम दो साल की सजा और साथ ही विधानसभा सदस्यता समाप्त होने की संभावना भी बनी रहती है।

संवैधानिक और राजनीतिक असर

इस प्रकरण को महज एक स्थानीय विवाद नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसके संवैधानिक और राजनीतिक प्रभाव भी गहरे हो सकते हैं। एक ओर जहां मामला अदालत में है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मच गई है। स्थानीय स्तर पर विपक्ष इसे भाजपा के नेताओं की बढ़ती अहंकारी प्रवृत्ति का प्रतीक बता रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि विधायक पर आरोप साबित हो जाते हैं तो उन्हें न सिर्फ सजा भुगतनी पड़ सकती है, बल्कि विधायक पद भी खतरे में पड़ जाएगा। इससे पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है, खासकर बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र में जहां पहले से भाजपा की पकड़ कमजोर हो रही है।

विधायक की चुप्पी पर सवाल

इस गंभीर मामले को लेकर विधायक राजेन्द्र मेश्राम की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न उन्होंने इस टिप्पणी को लेकर माफी मांगी है और न ही मीडिया से संवाद किया है। उनके चुप रहने को कुछ राजनैतिक विश्लेषक रणनीतिक चुप्पी बता रहे हैं, वहीं आमजनता इसे उत्तरदायित्व से बचाव की कोशिश मान रही है।

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अब सबकी निगाहें 4 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि विधायक कोर्ट में जमानत नहीं पेश करते हैं तो उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, अगर यह मामला राजनीतिक रंग लेता है तो भाजपा को आगामी विधानसभा चुनावों में जन असंतोष का सामना करना पड़ सकता है।

उमा भारती ने BJP पर साधा निशाना: “परिवार ने मेरी वजह से सालों तक अपमान झेला, टिकट कोई एहसान नहीं”

मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की फायरब्रांड नेता उमा भारती ने एक बार फिर अपनी ही पार्टी के खिलाफ तल्ख तेवर दिखाए हैं। इस बार उन्होंने अपने परिवार के बहाने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधा है। सोशल मीडिया पर किए गए एक भावुक पोस्ट में उन्होंने कहा कि राजनीति में उनके योगदान की वजह से उनके परिवार ने लंबे समय तक उपेक्षा और प्रताड़ना सही है, लेकिन भाजपा ने कभी इस दर्द को समझा नहीं।

“टिकट देना कोई एहसान नहीं, मजबूरी थी”

उमा भारती ने लिखा, “मेरे एक भाई के बेटे राहुल को टिकट देना भाजपा की कोई कृपा नहीं, पार्टी की राजनीतिक मजबूरी थी। बुंदेलखंड में यदि राहुल को टिकट नहीं मिलता तो भाजपा को भारी नुकसान हो सकता था।”
उन्होंने यह भी कहा कि उनका परिवार जनसंघ के समय से भाजपा में सक्रिय है, और उनके भतीजे राहुल और सिद्धार्थ तो उस समय से संघ में बाल स्वयंसेवक थे जब वह खुद राजनीति से दूर थीं।

परिवार को भुगतना पड़ा नुकसान

उमा भारती ने कहा, “मेरे भाइयों की संतानों ने सिर्फ मेरी छवि की चिंता में खुद को सीमित कर लिया। वे जितने योग्य थे, उतनी तरक्की नहीं कर सके। वे सिर्फ इसलिए पीछे रह गए क्योंकि वे मेरे परिवार के सदस्य थे।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा की सरकारों में भी उनके परिवार को पर्याप्त सम्मान और अवसर नहीं मिला।

सामंती शोषण का भी जिक्र

अपनी फेसबुक पोस्ट में उमा भारती ने टीकमगढ़ जिले के संदर्भ में लिखा कि वहां का “सामंती शोषण आज भी बरकरार है। यह भाजपा की सरकार में भी खत्म नहीं हो पाया।”
उन्होंने यह संकेत भी दिया कि भाजपा सरकारें भी इस समस्या को जड़ से खत्म करने में असफल रही हैं।

कांग्रेस और भाजपा, दोनों को घेरा

उमा भारती ने न सिर्फ भाजपा, बल्कि कांग्रेस की सरकारों को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने लिखा कि “सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की, मेरे परिवार को हमेशा मेरी वजह से प्रताड़ना ही मिली।”

सियासी संदेश क्या है?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उमा भारती का यह पोस्ट सिर्फ निजी दुख बयान करने के लिए नहीं है। यह एक स्पष्ट संदेश है – न सिर्फ भाजपा नेतृत्व को, बल्कि उन कार्यकर्ताओं और नेताओं को भी जो अब उन्हें पार्टी में हाशिए पर धकेलते नजर आते हैं।

हाल ही में भाजपा के टिकट वितरण को लेकर कई नेता नाराज दिखे हैं, और उमा का यह बयान ऐसे समय में आया है जब मध्यप्रदेश में संगठनात्मक फेरबदल की चर्चा भी जोरों पर है।

क्या लौटेगी उमा की सक्रियता?

एक दौर में मध्यप्रदेश की राजनीति में उमा भारती का नाम वजन रखता था। राम मंदिर आंदोलन से लेकर मुख्यमंत्री पद तक का सफर उनके राजनीतिक जीवन की ऊंचाई थी। अब जब वे लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए हुए हैं, यह पोस्ट कहीं न कहीं इस ओर भी इशारा करती है कि वे फिर से मुख्यधारा में आने का मन बना सकती हैं — या फिर भाजपा के भीतर दबे असंतोष को एक स्वर देने की भूमिका में होंगी।

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उमा भारती की यह पोस्ट भाजपा के लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि संगठन के भीतर उपेक्षित नेताओं की एक बड़ी भावना का प्रतीक भी हो सकती है। आगामी चुनावों से पहले ऐसे बयानों का असर पार्टी की छवि और आंतरिक एकता दोनों पर पड़ सकता है।

पटना में अस्पताल के अंदर गोलीबारी: पैरोल पर आए कैदी पर जानलेवा हमला, कानून-व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

बिहार की राजधानी पटना एक बार फिर से अपराधियों के निशाने पर है। मंगलवार सुबह शहर के एक नामी निजी अस्पताल में उस वक्त अफरातफरी मच गई जब इलाज के लिए भर्ती एक कैदी को अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी। इस घटना ने न सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि प्रदेश में अपराधियों के मनोबल को भी उजागर कर दिया है।

इलाज के दौरान गोलीबारी

जानकारी के अनुसार, गोली लगने वाला व्यक्ति एक विचाराधीन कैदी है, जो पैरोल पर बाहर आया था और इलाज के लिए पारस अस्पताल में भर्ती था। अस्पताल परिसर में अज्ञात हमलावर घुसे और कैदी को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। गोली लगते ही अस्पताल परिसर में चीख-पुकार मच गई और अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

घटना के तुरंत बाद हमलावर मौके से फरार हो गए। गोली लगने के बाद घायल कैदी को तत्काल इलाज के लिए भर्ती किया गया और डॉक्टरों ने उसकी हालत स्थिर बताई है।

SSP ने दी जानकारी

पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) ने मीडिया को बताया कि जैसे ही घटना की सूचना मिली, पुलिस की टीम मौके पर पहुंची और अस्पताल की घेराबंदी कर दी गई। पुलिस घटना की जांच में जुट गई है और आसपास के सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले जा रहे हैं। प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि हमले के पीछे पुरानी रंजिश एक बड़ी वजह हो सकती है, लेकिन फिलहाल किसी भी एंगल से इंकार नहीं किया जा रहा है।

अस्पताल में डर का माहौल

गोलीबारी की घटना ने अस्पताल स्टाफ और मरीजों में खौफ भर दिया है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि इस तरह की घटनाएं मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा करती हैं। सुरक्षा एजेंसियों को अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि राजधानी में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि वे अस्पताल जैसी जगहों पर भी निडर होकर वारदात को अंजाम देने से नहीं डरते।

विपक्ष का सरकार पर हमला

घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, “यह घटना बिहार में फैले गुंडा राज का जीता-जागता उदाहरण है। अब तो अस्पताल भी सुरक्षित नहीं बचे हैं। सरकार कानून-व्यवस्था को संभालने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है।”

तेजस्वी ने सरकार से मांग की कि अपराध पर तत्काल प्रभाव से नकेल कसी जाए और अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि आम जनता खुद को सुरक्षित महसूस कर सके।

पुलिस की अपील और कार्रवाई

पुलिस ने आम जनता से अपील की है कि अगर किसी के पास इस घटना से जुड़ी कोई भी जानकारी हो, तो वह तुरंत पुलिस से संपर्क करे। इसके साथ ही शहर में सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रमुख अस्पतालों, जेलों और कोर्ट परिसर के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जा रहा है।

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अस्पताल जैसे संवेदनशील और सुरक्षित माने जाने वाले स्थान पर इस प्रकार की वारदात पुलिस की कार्यशैली और खुफिया तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यह घटना बिहार की कानून-व्यवस्था की पोल खोलती है और यह संकेत देती है कि अपराधियों को कानून का कोई डर नहीं रह गया है।

छात्रावासों और आश्रमों में सुविधाओं का टोटा: बच्चों को नहीं मिल रही मूलभूत जरूरतें, अधिकारी नदारद

सीधी (मध्यप्रदेश)
शासन की ओर से संचालित आदिवासी छात्रावासों और आश्रमों का मकसद वंचित तबके के बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देना है, लेकिन सीधी जिले में इनका हाल बेहाल है। आदिम जाति कल्याण विभाग के अधीन चल रहे इन संस्थानों में न तो नियमित भोजन की व्यवस्था है और न ही पर्याप्त कपड़े-बिस्तर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। ऊपर से निरीक्षण का कोई पुख्ता तंत्र नहीं होने के कारण अधीक्षक और अधीक्षिकाएं पूरी तरह से स्वेच्छाचारी हो गए हैं।

बजट मिलता है लेकिन सुविधाएं नहीं

जानकारी के अनुसार, शासन द्वारा हर साल छात्रावासों के संचालन, भोजन, कपड़े, नास्ता और बिस्तर जैसी जरूरी चीजों के लिए पर्याप्त बजट जारी किया जाता है। लेकिन यह बजट बच्चों तक नहीं पहुंचता। ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रावासों में बच्चों को सुबह का नाश्ता नहीं दिया जाता। अधिकांश जगहों पर दोपहर और रात का खाना भी बेहद खराब गुणवत्ता का होता है — दाल के नाम पर पीला पानी, बासी चावल और स्वादहीन सब्जी। बच्चों ने शिकायत की है कि कई बार भूखा रहना पड़ता है।

अधिकारियों की गैरहाजिरी, निरीक्षण नाम मात्र का

जिलों में अधीक्षक अपनी मनमर्जी से कार्य कर रहे हैं। ग्रामीण छात्रावासों में अधीक्षक रात को वहां रुकते तक नहीं, जबकि उनकी जिम्मेदारी 24 घंटे की है। कई छात्रावासों में तो बच्चों की देखरेख के लिए कोई स्थायी व्यवस्था तक नहीं रहती। शहरी क्षेत्र की स्थिति थोड़ी बेहतर हो सकती है, लेकिन गांवों में हालात बेहद चिंताजनक हैं।

सूत्रों के अनुसार, अधीक्षक फर्जी बिल और बाउचर लगाकर बजट का बड़ा हिस्सा डकार जाते हैं। बच्चों को न तो नए कपड़े मिलते हैं, न ही साफ बिस्तर। पुराने, फटे-चिथड़े बिस्तरों का उपयोग वर्षों से किया जा रहा है। ठंड के दिनों में बच्चों को गर्म कपड़े और रजाई-कंबल भी नहीं मिलते, जिसके लिए उनके अभिभावकों को घर से व्यवस्था करनी पड़ती है।

बच्चों की आवाज़ दबा दी जाती है

ग्रामीण और गरीब तबके के बच्चों को डराया जाता है कि शिकायत करने पर उन्हें छात्रावास से निकाल दिया जाएगा। उनके परिजन भी इस भय के कारण चुप रहते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि सरकारी व्यवस्था से ही उनके बच्चों को शिक्षा मिल रही है। ऐसे में छात्रावास की अव्यवस्थाएं बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही हैं।

शासन-प्रशासन मौन, सुधार की नहीं कोई पहल
शिक्षा विभाग और आदिम जाति कल्याण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इन समस्याओं को लेकर पूरी तरह से उदासीन नजर आते हैं। अब तक किसी बड़े अफसर ने इन आश्रमों और छात्रावासों का औचक निरीक्षण नहीं किया। बच्चों को दिए जाने वाले साबुन, तेल जैसी मूलभूत सुविधाएं तक अधीक्षकों की मनमर्जी पर निर्भर हैं।

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सीधी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी छात्रावासों और आश्रमों की दुर्दशा यह दर्शाती है कि सरकारी योजनाएं कागज़ों पर भले ही सशक्त दिखती हों, ज़मीनी स्तर पर उनका हाल बंटाधार है। अगर समय रहते व्यवस्था में पारदर्शिता और कड़ाई नहीं लाई गई, तो यह कुप्रथा न केवल बच्चों के भविष्य को निगल जाएगी, बल्कि शिक्षा के मंदिरों को बदनामी का अड्डा बना देगी। शासन को जल्द से जल्द निरीक्षण प्रणाली को सक्रिय करते हुए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।

शिक्षा या शोषण? निगरी हाई स्कूल में छात्रों से करवाई जा रही मजदूरी, तालाब से पानी लाकर बनवाया जा रहा मसाला

निगरी, मध्यप्रदेश। जिले के निवास संकुल अंतर्गत निगरी हाई स्कूल से एक चौंकाने वाली और चिंताजनक घटना सामने आई है। जहां बच्चों को पढ़ाई कराने की बजाय मजदूरी करवाई जा रही है। यह घटना न केवल शिक्षा के मूल उद्देश्य को ध्वस्त करती है, बल्कि बाल अधिकारों का सीधा उल्लंघन भी है।

तालाब से पानी ढोकर बनवाया जा रहा सीमेंट का मसाला

स्कूल में अध्ययनरत छात्रों ने खुलासा किया कि उन्हें तालाब से पानी लाने भेजा गया, जिससे स्कूल परिसर में रेत और सीमेंट का मसाला तैयार किया जा सके। यह कार्य विद्यालय प्राचार्य के निर्देश पर कराए जाने की बात सामने आई है। छात्रों का कहना है कि उन्हें लगातार इस तरह के कार्यों में लगाया जाता है और इससे उनकी पढ़ाई पर गंभीर असर पड़ रहा है।

शिक्षा के मंदिर में हो रहा श्रम शोषण

जब एक छात्र से सवाल किया गया कि उन्हें पानी लाने के लिए क्यों भेजा गया, तो उसने बताया,

“साब बोले थे कि स्कूल का काम है, पढ़ाई के बाद सबको मिलकर मदद करना पड़ेगा।”

लेकिन यह “मदद” अब दैनिक मजदूरी जैसे कार्यों में बदल चुकी है। शिक्षा के नाम पर बच्चों से इस प्रकार का श्रम करवाना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह शिक्षा का अपमान है।

बच्चों में डर का माहौल, उपस्थिति भी घटी

स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि इस तरह के हालात के कारण बच्चे स्कूल आने से डरने लगे हैं। उन्हें डर है कि पढ़ाई के नाम पर उन्हें फिर से कोई निर्माण कार्य या अन्य मजदूरी का कार्य न सौंप दिया जाए। यही वजह है कि स्कूल में छात्रों की उपस्थिति दिन-ब-दिन घट रही है।यह भी पढ़ें:-

जिम्मेदार अधिकारी चुप, कार्रवाई नहीं

इस पूरे मामले में हैरानी की बात यह है कि शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी बनी हुई है। शिकायतें किए जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे क्षेत्र में यह संदेश जा रहा है कि या तो शासन-प्रशासन आंख मूंदे बैठा है, या फिर ऐसे मामलों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

अभिभावकों में रोष, कार्रवाई की मांग

स्थानीय अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने इस कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि अगर इस मामले को अनदेखा किया गया, तो यह कुप्रथा बच्चों के भविष्य को निगल जाएगी।

एक अभिभावक ने कहा

“हमने अपने बच्चों को पढ़ने भेजा है, मजदूरी करने नहीं। स्कूल को मंदिर कहा जाता है, पर यहां तो बच्चों को मजदूर बना दिया गया है।”

बाल श्रम कानून का उल्लंघन

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला बाल श्रम निषेध कानून के दायरे में आता है और इसके लिए जिम्मेदारों पर आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।
किसी भी स्थिति में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी कराना कानूनन अपराध है, और स्कूल जैसी संस्था में यदि ऐसा हो रहा है तो यह अत्यंत शर्मनाक है।

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निगरी हाई स्कूल की यह घटना शिक्षा व्यवस्था पर सीधा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।
बच्चों के हाथों में किताबों की जगह फावड़ा थमाना, उनके भविष्य को अंधकार में धकेलने जैसा है।
अब ज़रूरत इस बात की है कि प्रशासन नींद से जागे, और दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे, ताकि शिक्षा का मंदिर फिर से सम्मानित हो सके और बच्चों को उनका हक मिल सके – शिक्षा का अधिकार, न कि श्रम।