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नीमच-रतलाम रेलवे लाइन के दोहरीकरण और विद्युतीकरण कार्य अंतिम चरण में, दिसंबर तक पूरा होगा 1100 करोड़ का प्रोजेक्ट

मध्यप्रदेश के दो प्रमुख जिलों रतलाम और नीमच को जोड़ने वाली रेलवे लाइन पर दोहरीकरण (Doubling) और विद्युतीकरण (Electrification) का कार्य अब अंतिम चरण में है। दिसंबर 2025 तक इसके पूर्ण होने की उम्मीद है। इस परियोजना से न केवल यात्री सुविधाएं बेहतर होंगी, बल्कि उद्योग, व्यापार और जीडीपी विकास की रफ्तार भी तेज होगी।

1100 करोड़ की लागत से हो रहा काम

इस परियोजना पर करीब 1100 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सितंबर 2021 में इस योजना को हरी झंडी मिली थी और तभी से कार्य शुरू कर दिया गया था। नीमच से दलौदा, दलौदा से बड़ायला चौरासी, और फिर बड़ायला चौरासी से रतलाम तक के खंडों पर या तो कार्य पूरा हो चुका है या अंतिम चरण में है।

रेलवे की इस योजना के अंतर्गत नए प्लेटफॉर्म, यात्री प्रतीक्षालय, पेनल रूम जैसे कई बुनियादी ढांचे भी विकसित किए जा रहे हैं। रतलाम रेल मंडल के जनसंपर्क अधिकारी खेमराज मीणा के अनुसार यह प्रोजेक्ट यात्रियों और व्यापार दोनों के लिए फायदेमंद साबित होगा।

यात्री और मालगाड़ियों की संख्या में इजाफा

रेलवे दोहरीकरण से यात्रियों को तेज गति की ट्रेनें मिलेंगी और मालगाड़ियों की संख्या में भी बढ़ोतरी होगी। इससे औद्योगिक क्षेत्रों में लॉजिस्टिक सुविधा आसान होगी और वाणिज्यिक गतिविधियों में तेजी आएगी।

रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलों में स्थित औद्योगिक क्षेत्रों को माल ढुलाई में सुगमता मिलेगी, जिससे उत्पादन और निर्यात में बढ़त होगी।

आर्थिक लाभ और रोजगार के नए अवसर

इस रेलवे प्रोजेक्ट का सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। रतलाम जिले की आबादी 14 लाख से अधिक है और राज्य सरकार के अनुसार यहां की प्रति व्यक्ति आय ₹1,40,583 है। अनुमान है कि तेज ट्रेन सेवाओं और बेहतर परिवहन से प्रति व्यक्ति आय और रोजगार में इजाफा होगा।

औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों में भी तेजी आएगी, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

उद्योगों को मिलेगा विशेष फायदा

रतलाम और आस-पास के इलाकों में तांबे की तार, रसायन, ऑक्सीजन गैस, प्लास्टिक की रस्सी, सोना-चांदी, रतलामी साड़ी और हस्तशिल्प जैसे कई उद्योग सक्रिय हैं। रेलवे दोहरीकरण से इन क्षेत्रों में कच्चे माल की आपूर्ति और तैयार माल की बिक्री आसान होगी। यह निर्यात को भी बढ़ावा देगा।

दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर से भी जुड़ेगा फायदा

रेलवे लाइन के इस उन्नयन से दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (DMIC) के निकट 14,000 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित औद्योगिक विकास को भी बल मिलेगा। वहीं, अल्कोहल प्लॉट की 29 हेक्टेयर जमीन पर उद्योग लगाने की प्रक्रिया भी इस योजना के साथ गति पकड़ सकती है।

पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय मंच

रतलाम की नमकीन और साड़ी क्लस्टर जैसी पारंपरिक पहचान को भी इस विकास से नई उड़ान मिलेगी। तेज गति की ट्रेनें और सुधरा हुआ रेल नेटवर्क स्थानीय व्यापारियों को राष्ट्रीय बाजारों तक आसानी से पहुंचने में मदद करेगा।

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नीमच-रतलाम रेलवे दोहरीकरण और विद्युतीकरण परियोजना केवल रेलवे इन्फ्रास्ट्रक्चर को ही नहीं बल्कि पूरा क्षेत्रीय सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को बदलने वाली साबित हो सकती है। दिसंबर 2025 में इसके पूर्ण होने के बाद यह क्षेत्र मध्यप्रदेश के सबसे तेज़ विकसित होते कॉरिडोर में शामिल हो सकता है।

नशे से मुक्ति की ओर सीधी का संकल्प: जागरूकता रथ को हरी झंडी, घर-घर पहुंचेगा संदेश

सीधी, मध्यप्रदेश। नशा मुक्त समाज की दिशा में सीधी जिले ने एक बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है। 15 जुलाई 2026 को दोपहर 1 बजे कलेक्ट्रेट परिसर से “नशा मुक्ति जागरूकता रथ” को विधिवत रूप से रवाना किया गया। यह रथ जिले के हर गांव, मोहल्ले और स्कूल तक जाकर लोगों को नशे के दुष्परिणामों से अवगत कराएगा और नशामुक्त जीवन के लिए प्रेरित करेगा।

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की रही अहम मौजूदगी

इस अभियान की अगुवाई पुलिस विभाग द्वारा की गई, जिसमें जिले के प्रमुख जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने भागीदारी निभाई। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि सीधी विधायक रीति पाठक मौजूद रहीं। उनके साथ कलेक्टर स्वरोचिस सोमवंशी, पुलिस अधीक्षक डॉ. रविंद्र वर्मा, एडिशनल एसपी अरविंद श्रीवास्तव, डीएसपी सहित जिला प्रशासन के अन्य अधिकारी भी उपस्थित रहे।

इन सभी गणमान्य जनों ने रथ को हरी झंडी दिखाकर नशा मुक्ति के इस संकल्प को आगे बढ़ाया और जिले को एक स्वस्थ, जागरूक और नशामुक्त समाज बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

हर गली, हर गांव तक पहुंचेगा रथ

एसपी डॉ. रविंद्र वर्मा ने इस अवसर पर कहा,

“हमारा उद्देश्य सिर्फ कार्यक्रम करना नहीं, बल्कि नशा मुक्ति का संदेश हर घर और हर दिल तक पहुंचाना है।”

उन्होंने बताया कि यह जागरूकता रथ न केवल शहरों में बल्कि गांवों, गलियों, स्कूलों और मोहल्लों तक जाएगा। वहां पर नुक्कड़ नाटक, जनसंवाद, चित्र प्रदर्शन और पर्चा वितरण जैसे माध्यमों से नशे के खतरे के बारे में बताया जाएगा। यह रथ लोगों को जागरूक करेगा कि नशा कैसे व्यक्ति, परिवार और समाज तीनों को खोखला कर देता है।

रोज़ नए स्वरूप में दिखेगा अभियान

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि रथ अभियान को एक सामाजिक आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। रथ हर दिन एक नए क्षेत्र, नई शैली और नए दर्शकों के बीच पहुंचेगा।
कभी यह अभियान विद्यालयों के छात्रों के बीच, तो कभी महिलाओं, युवाओं और जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर चलाया जाएगा।

समाज की सहभागिता से ही संभव है सफलता

अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि इस अभियान को सफल बनाने के लिए केवल सरकार नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा। उन्होंने अपील की कि अभिभावक, शिक्षक, सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं और युवा वर्ग इस मुहिम में सक्रिय भाग लें और सीधी को नशामुक्त जिला बनाने में सहयोग करें।

विधायक रीति पाठक का संकल्प

विधायक रीति पाठक ने अपने संबोधन में कहा:

“युवा हमारे देश की रीढ़ हैं। यदि वे नशे की चपेट में आ जाएंगे तो राष्ट्र का भविष्य संकट में पड़ जाएगा। हमें हर हाल में अपने बच्चों को इस दलदल से निकालना है।”

उन्होंने कहा कि नशे की लत केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को मूल्य चुकाने पर मजबूर कर देती है।

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सीधी जिले का यह अभियान महज एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक जनांदोलन की शुरुआत है। “नशा छोड़ो, जीवन जोड़ो” की थीम के साथ जागरूकता रथ अब जिले के हर कोने में नशा मुक्त जीवन का संदेश लेकर पहुंचेगा।
यह उम्मीद की जा रही है कि जनभागीदारी और प्रशासन की सक्रियता से यह रथ सीधी को पूरे प्रदेश के लिए एक आदर्श के रूप में स्थापित करेगा।

कुसमी के सीएम राइज स्कूल में चला नशामुक्ति अभियान, छात्रों को दी गई जागरूकता की सीख

भोपाल पुलिस मुख्यालय द्वारा प्रदेशभर में चलाए जा रहे “नशे से दूरी है जरूरी” अभियान के तहत दिनांक 15 जुलाई 2026 को सिंगरौली जिले के कुसमी थाना क्षेत्र अंतर्गत सीएम राइज हायर सेकेंडरी स्कूल, कुसमी में एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवाओं को नशे के दुष्परिणामों के बारे में अवगत कराना और समाज में नशामुक्ति की सोच को प्रोत्साहित करना था।

समाज को खोखला कर रहा है नशा

कार्यक्रम की शुरुआत में अधिकारियों ने बताया कि नशा केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि परिवार, समाज और देश की नींव को भी कमजोर करता है। नशे की लत इंसान की मानसिकता, सोच और व्यवहार को इस हद तक प्रभावित करती है कि वह सकारात्मक जीवनशैली से भटककर आत्मघाती राह पर निकल पड़ता है।

समाज में बढ़ते नशे की प्रवृत्ति को रोकने के लिए सिर्फ कानूनी व्यवस्था ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए जन-जागरूकता, संवेदनशील संवाद और भावनात्मक सहयोग जरूरी है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि युवाओं को सही दिशा देने के लिए शिक्षक, अभिभावक और पुलिस तीनों को मिलकर काम करना होगा।

विद्यार्थियों को दिलाई गई नशामुक्ति की शपथ

इस अवसर पर विद्यालय के छात्रों, शिक्षकों और उपस्थित नागरिकों को “नशामुक्त जीवन” की शपथ दिलाई गई। कार्यक्रम के दौरान पोस्टर और स्लोगन भी वितरित किए गए, जिनमें नशा विरोधी संदेश छपे थे जैसे:

  • “नशा नहीं, शिक्षा अपनाओ”
  • “नशा छोड़ो, जीवन जोड़ो”
  • “जवानी को बचाओ, नशे से दूर रहो”

इस अभियान का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी सामने रखा गया, जिसमें बताया गया कि किस तरह नशे की गिरफ्त में आने वाले युवाओं को समाज के सहयोग से सुधारा जा सकता है।

अधिकारियों की उपस्थिति ने बढ़ाया उत्साह

इस जागरूकता अभियान में थाना प्रभारी कप्तान सिंह, एएसआई नंद प्रकाश सिंह, प्रधान आरक्षक हृदयलाल दीवान, आरक्षक कमलेश प्रजापति और रामेश्वर सिंह ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

विद्यालय की ओर से शिक्षक सोमनाथ कोल, अन्य स्टाफ सदस्य और सैकड़ों छात्र-छात्राएं कार्यक्रम में मौजूद रहे। विद्यार्थियों ने खुले मंच पर अपने विचार और अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे अब इस अभियान को अपने गांव और मोहल्लों में भी फैलाएंगे।

संदेश यही: नशा नहीं, जीवन हाँ

कार्यक्रम का समापन एक प्रेरणादायक संदेश के साथ किया गया – “नशा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि शुरुआत है कई नई समस्याओं की। इसे त्यागना ही जीवन की ओर पहला सही कदम है।”

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इस अभियान के माध्यम से स्पष्ट रूप से यह संदेश गया कि नशे से लड़ाई सिर्फ एक विभाग या संगठन की नहीं, समूचे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर हर नागरिक इस पहल में सहयोग करे, तो नशामुक्त भारत का सपना जल्दी साकार हो सकता है।

जस्टिस संजीव सचदेवा 17 जुलाई को लेंगे मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ, जानें कौन हैं वे

राज्यपाल मंगुभाई पटेल दिलाएंगे शपथ, जबलपुर हाईकोर्ट में 18 जुलाई को होगा स्वागत समारोह

भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को नया मुख्य न्यायाधीश मिल गया है। वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस संजीव सचदेवा 17 जुलाई 2025 को प्रदेश के नव नियुक्त चीफ जस्टिस के रूप में राज्यपाल मंगुभाई पटेल से शपथ लेंगे। यह शपथग्रहण समारोह राजभवन, भोपाल में सुबह 10:00 बजे आयोजित किया जाएगा। वर्तमान में वे हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस के रूप में सेवा दे रहे थे।

18 जुलाई को हाईकोर्ट में होगा अभिनंदन समारोह

शपथ ग्रहण के अगले दिन, 18 जुलाई को जबलपुर हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों द्वारा उनका औपचारिक स्वागत किया जाएगा। समारोह की तैयारियों को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में प्रशासनिक स्तर पर कवायद तेज हो चुकी है।

जस्टिस संजीव सचदेवा का शैक्षणिक सफर

जस्टिस संजीव सचदेवा का जन्म 26 दिसंबर, दिल्ली में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई दिल्ली पब्लिक स्कूल, मथुरा रोड से पूरी करने के बाद उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (दिल्ली विश्वविद्यालय) से B.Com (ऑनर्स) किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर से LLB की डिग्री प्राप्त की।

कानूनी करियर की मजबूत नींव

  • 1988 में उन्होंने दिल्ली बार काउंसिल में वकील के रूप में पंजीकरण कराया।
  • 1992 में उन्हें ब्रिटिश काउंसिल स्कॉलरशिप प्राप्त हुई, जिसके तहत उन्होंने कॉमनवेल्थ यंग लॉयर्स कोर्स लंदन से पूरा किया।
  • 1995 में वे सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के रूप में नामांकित हुए।
  • लंबे समय तक देश के उच्च न्यायालयों में सक्रिय वकालत करने के बाद, उन्हें 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

एमपी हाईकोर्ट से जुड़ाव

जस्टिस सचदेवा का मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जुड़ाव वर्ष 2024 में तब हुआ, जब उनका ट्रांसफर दिल्ली से एमपी हाईकोर्ट में किया गया। जुलाई से सितंबर 2024 और मई 2025 के बीच उन्होंने कार्यवाहक चीफ जस्टिस के रूप में कार्यभार संभाला। उनकी कार्यशैली को देखते हुए उन्हें 14 जुलाई 2025 को पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

न्यायिक विशेषज्ञता और पहचान

जस्टिस सचदेवा की न्यायिक कार्यशैली हमेशा निष्पक्षता और त्वरित न्याय के लिए जानी जाती रही है। उन्होंने अपने करियर में संविधान, आपराधिक, सिविल और प्रशासनिक मामलों में कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। उन्हें कानून के व्यावहारिक दृष्टिकोण, समाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता और न्यायालयीन प्रक्रियाओं के सरलीकरण के लिए जाना जाता है।

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जस्टिस संजीव सचदेवा की नियुक्ति मध्यप्रदेश न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव मानी जा रही है। उनके अनुभव और निर्णय क्षमता से निश्चित ही प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। जनता और अधिवक्ताओं को उनसे न्याय में पारदर्शिता और गति की अपेक्षा है।

यूरिया के अंधाधुंध इस्तेमाल से बिगड़ रही मिट्टी की सेहत, फसलें और मानव स्वास्थ्य भी चपेट में

मध्यप्रदेश के खेतों में हर साल बेहतर उत्पादन की चाहत किसानों को यूरिया के अत्यधिक प्रयोग की ओर धकेल रही है। लेकिन अब इस लालच की भारी कीमत न केवल किसान, बल्कि जमीन और इंसानी सेहत भी चुका रही है। वर्ष 2024-25 की मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है – प्रदेश की उपजाऊ मिट्टी लगातार अपनी गुणवत्ता खो रही है।

सिर्फ नाइट्रोजन नहीं, जिंक और पोटाश की भी कमी

रिपोर्ट के अनुसार, नाइट्रोजन और फास्फोरस की भरपाई तो किसान डीएपी और यूरिया से कर रहे हैं, लेकिन पोटाश और जिंक जैसे आवश्यक पोषक तत्वों की लगातार अनदेखी की जा रही है। इसका असर अब जमीन की उर्वरक क्षमता पर साफ नजर आने लगा है।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसएस सारंगदेवोत का कहना है,

“अधिक यूरिया इस्तेमाल करने से पौधे अस्वाभाविक रूप से नरम और अधिक पत्तेदार हो जाते हैं, जिससे उन पर कीट लगने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।”

उत्पादन का लालच, लेकिन नुकसान ज्यादा

एक एकड़ में दो बोरी यूरिया पर्याप्त मानी जाती है, लेकिन अभी किसान 5 से 6 बोरी तक इस्तेमाल कर रहे हैं, जो खेती के लिए ज़हर बनता जा रहा है। इससे फसल में देरी, लागत में बढ़ोतरी और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट हो रही है। यही नहीं, ज़्यादा पत्तेदार फसलें कमजोर जड़ प्रणाली के कारण तेज़ बारिश या हवा में जल्दी नष्ट हो जाती हैं।

जहरीली दवाओं से फसलें तबाह, रतलाम में 30 किसानों की मेहनत बर्बाद

रतलाम जिले के जावरा क्षेत्र के पंचेवा जेठाना और नोलखा गांवों में 30 से अधिक किसानों की करीब 500 बीघा फसल उस समय बर्बाद हो गई, जब उन्होंने खरपतवार खत्म करने के लिए खेतों में एक खास रासायनिक दवा का छिड़काव किया।

किसानों का दावा है कि खेत के उसी हिस्से में फसल मारी गई जहाँ दवा डाली गई थी, जबकि बाकी फसलें सुरक्षित हैं। किसानों ने नायब तहसीलदार वैभव कुमार जैन को ज्ञापन सौंपते हुए दवा कंपनी पर प्रकरण दर्ज करने और मुआवजा दिलाने की मांग की है।

मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर

अत्यधिक यूरिया उपयोग से केवल खेत नहीं, मानव स्वास्थ्य भी खतरे में है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरिया से निकलने वाली नाइट्रस ऑक्साइड गैस वायु प्रदूषण को बढ़ावा देती है। साथ ही पानी में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने से यह जलीय जीवों के लिए घातक हो जाती है।

डॉ. सारंगदेवोत के अनुसार,

“यूरिया का अति उपयोग उच्च रक्तचाप, किडनी व लीवर समस्याएं और बच्चों में त्वचा व सांस संबंधी बीमारियों का कारण बन सकता है।”

क्या है समाधान?

विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि किसान केवल यूरिया और डीएपी के बजाय एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) और जिंक का संतुलित उपयोग करें, तो न केवल मिट्टी की सेहत सुधरेगी, बल्कि उत्पादन भी स्थायी रूप से बढ़ेगा।

कृषि विभाग ने भी मिट्टी परीक्षण कराने और सिफारिश के अनुसार खाद डालने की सलाह किसानों को दी है। साथ ही रासायनिक दवाओं के प्रति जागरूकता फैलाने की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है।

खेती को बचाना है, तो संतुलन जरूरी

मिट्टी केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, वह किसानों की जीवनरेखा और समाज की खाद्य सुरक्षा की नींव है। यूरिया और रसायनों का बेइंतहा इस्तेमाल जल्द मुनाफा भले दे, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान कहीं ज़्यादा घातक है।

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राज्य सरकार और वैज्ञानिकों को मिलकर अब इस दिशा में मजबूत जागरूकता और प्रशिक्षण अभियान चलाने की जरूरत है, ताकि किसानों को उत्पादन की होड़ में मिट्टी की मौत का साधन ना बनना पड़े।

जिला अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर कांग्रेस सक्रिय, हर जिले से 6 नामों का पैनल तैयार

मध्य प्रदेश कांग्रेस में जिला अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर संगठनात्मक गतिविधियां तेज हो गई हैं। आगामी दिनों में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है। दिल्ली में आयोजित 14 जुलाई की बैठक में इस विषय पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई, जिसमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, सभी ऑब्जर्वर और राष्ट्रीय संगठन प्रभारी केसी वेणुगोपाल समेत कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए।

हर जिले से भेजे गए 6 नामों के पैनल

बैठक में प्रदेश कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के तहत हर जिले से 6 संभावित नेताओं का पैनल तैयार कर दिल्ली में पेश किया। रिपोर्ट के अनुसार, इन नामों का चयन ज़मीनी फीडबैक, संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक सक्रियता के आधार पर किया गया है। यह पैनल 30 जून तक आलाकमान को भेज दिया गया था, जिस पर अब अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

गुजरात मॉडल को अपनाने की तैयारी

सूत्रों के मुताबिक, इस बार मध्य प्रदेश कांग्रेस गुजरात मॉडल को लागू करने की तैयारी में है। गुजरात में हाल ही में 40 में से 36 जिलों में नए अध्यक्षों की नियुक्ति की गई थी, और सिर्फ 4 पुराने चेहरों को दोहराया गया था। मध्य प्रदेश में भी इसी तर्ज पर अधिकतर जिलों में नए और ऊर्जावान चेहरों को मौका देने की रणनीति अपनाई जा रही है।

PC शर्मा का बड़ा बयान

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने संकेत दिए हैं कि 15 अगस्त के मौके पर नए जिला अध्यक्ष तिरंगा फहराएंगे। यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि पार्टी जल्द ही नए जिला अध्यक्षों की घोषणा कर सकती है। शर्मा ने यह भी कहा कि एनजीओ, कार्यकर्ताओं और मीडिया से लगातार फीडबैक लेकर ही चयन प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

इस बार की चयन प्रक्रिया में कांग्रेस नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा से करीबी रखने वाले नेता संगठन में जगह नहीं पाएंगे। ऐसे सभी नेताओं को जिला अध्यक्ष बनने की दौड़ से बाहर कर दिया गया है। इसके लिए नई गाइडलाइन भी जारी की गई है, जिसमें संगठन के प्रति पूर्ण निष्ठा और सक्रियता को पहली प्राथमिकता दी गई है।

4 लाख कार्यकर्ताओं से हुआ सीधा संवाद

संगठन सृजन अभियान के तहत पार्टी ने प्रदेशभर के 4 लाख से ज्यादा कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद किया, जिनसे न केवल स्थानीय मुद्दों की जानकारी ली गई, बल्कि योग्य कार्यकर्ताओं के नाम भी संकलित किए गए। यही जानकारी संगठन को और अधिक मजबूत और जीवंत बनाने के लिए आधार बनी।

राष्ट्रीय पर्यवेक्षक गांव-गांव कर रहे दौरा

प्रदेश कांग्रेस की मंशा केवल नाम बदलने की नहीं है, बल्कि वह जमीनी कार्यकर्ताओं को नेतृत्व में लाने की दिशा में भी कार्य कर रही है। यही कारण है कि दिल्ली से आए राष्ट्रीय पर्यवेक्षक खुद गांव-गांव जाकर संभावित जिला अध्यक्षों की योग्यता का आकलन कर रहे हैं। इससे साफ है कि इस बार की चयन प्रक्रिया अंदरूनी गुटबाजी से ऊपर उठकर एक पारदर्शी और मेरिट आधारित ढांचे पर आधारित होगी।

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कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व की यह कोशिश संगठन को नवजीवन देने और कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा करने का प्रयास मानी जा रही है। पुराने चेहरों को हटाकर नए और सक्रिय लोगों को मौका देने की रणनीति ने पार्टी के अंदर एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा भी शुरू कर दी है।

अब देखना यह होगा कि आलाकमान किस-किस नाम पर अंतिम मुहर लगाता है और क्या वाकई 15 अगस्त तक नए जिलाध्यक्षों की घोषणा हो जाती है या फिर यह प्रक्रिया अभी और लंबी खिंचती है।

ट्रॉमा सेंटर में पदस्थ गायनेकोलॉजिस्ट और डेंटल डॉक्टर पर गंभीर आरोप, जांच के बाद भी कार्रवाई शून्य!

सिंगरौली जिले का जिला अस्पताल स्थित ट्रॉमा सेंटर इन दिनों एक बार फिर से भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोपों की वजह से सुर्खियों में है। जहां एक ओर सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर मरीजों के साथ हो रही कथित धन वसूली ने पूरे चिकित्सा तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

डेंटल डॉक्टर पर लगे पैसे वसूली के गंभीर आरोप

मामला ट्रॉमा सेंटर में कार्यरत बांड पर पदस्थ डेंटल डॉक्टर रचना सिंह का है, जिन पर दो अलग-अलग मरीजों से कथित तौर पर 25 हजार और 5 हजार रुपये की वसूली करने का आरोप लगाया गया है।

आरोप है कि डॉक्टर ने सरकारी अस्पताल में उपचार के बजाय मरीजों को अपने निजी क्लीनिक बुलाकर पैसे लिए। शिकायत के अनुसार, ट्रॉमा में भर्ती दो मरीजों — रामबृज केवट और लालजीत पंडो, जो मुंह की गंभीर चोटों से पीड़ित थे — उनके परिजनों से मोटी रकम वसूली गई।

सीधे सिविल सर्जन से की गई शिकायत

यह मामला तब उजागर हुआ जब सिविल सर्जन अस्पताल भ्रमण पर थे। उसी दौरान मरीजों के परिजनों ने मौके पर ही डॉक्टर पर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि डॉक्टर ने इलाज के नाम पर उन्हें अपने निजी क्लीनिक पर बुलाया और वहां इलाज के लिए पैसा मांगा।

शिकायत सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने जांच बैठाई, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अब तक न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई है और न ही डॉक्टर के खिलाफ कोई विभागीय नोटिस जारी किया गया है।

कहां है जवाबदेही?

यह सवाल अब उठ रहा है कि जब शिकायत प्रत्यक्ष रूप से सिविल सर्जन के समक्ष दर्ज की गई, और मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रारंभिक जांच भी कराई गई, तब भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है?

क्या यह चिकित्सा क्षेत्र में फैले “बिना डर के भ्रष्टाचार” की एक और बानगी है?

गायनेकोलॉजिस्ट पर भी संदेह

सूत्रों की मानें तो ट्रॉमा सेंटर में पदस्थ एक गायनेकोलॉजिस्ट पर भी ऐसे ही आर्थिक शोषण के आरोप समय-समय पर सामने आए हैं, लेकिन हर बार मामले को दबा दिया गया। ऐसा प्रतीत होता है जैसे सिस्टम खुद इन आरोपों को संरक्षण दे रहा है

प्रशासनिक चुप्पी से नाराज जनता

स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर स्वास्थ्य विभाग पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि यदि ऐसे मामलों पर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो आम जनता का सरकारी स्वास्थ्य तंत्र से विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

क्या कहता है नियम?

सरकारी अस्पताल में पदस्थ डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस की अनुमति नहीं होती। यदि कोई डॉक्टर मरीजों को निजी क्लीनिक भेजकर पैसे वसूलता है तो यह आचार संहिता का उल्लंघन और कानूनी अपराध माना जाता है।

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मामला केवल आर्थिक अनियमितता का नहीं है, यह गंभीर नैतिक और पेशेवर लापरवाही का विषय है। जब जनता जीवन और मौत की लड़ाई लड़ रही हो, तब डॉक्टरों द्वारा की गई ऐसी हरकतें केवल पेशेवर अपराध नहीं बल्कि मानवीय संवेदना की हत्या भी कही जा सकती हैं।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस पर क्या ठोस कदम उठाते हैं — या फिर यह मामला भी रोज़मर्रा की फाइलों में दफन होकर भुला दिया जाएगा

बिहार में SIR को लेकर बीजेपी की रणनीतिक हलचल, विपक्ष ने उठाए सवाल

बिहार में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई विशेष इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है। जहां विपक्ष इसे आम जनता के मताधिकार से वंचित होने का खतरा बता रहा है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी अब इस मुद्दे की तपिश महसूस करने लगी है। पार्टी के संगठन स्तर पर भी इस प्रक्रिया को लेकर निराशाजनक फीडबैक मिलने की खबरें सामने आ रही हैं।

भीखू भाई दलसानिया ने बुलाई आपात बैठक

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर 14 जुलाई को BJP के संगठन सचिव भीखू भाई दलसानिया ने राज्य भर के 26 प्रदेश पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में उन्होंने साफ निर्देश दिया कि पार्टी कार्यकर्ता मतदाताओं के बीच जाएं, उनकी आशंकाएं दूर करें और नामांकन प्रक्रिया में हर संभव मदद करें।

एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि,

“हमने यह महसूस किया है कि विपक्ष इस मुद्दे पर हमसे आगे निकल गया है। उन्होंने बूथ स्तर पर एक्टिव एजेंट खड़े कर दिए हैं, जबकि हमारे ग्राउंड वर्कर्स अभी पीछे हैं।”

विपक्ष की आक्रामक रणनीति और बीजेपी की चिंता

इस बीच विपक्ष SIR प्रक्रिया को लेकर बेहद आक्रामक मुद्रा में है। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग जल्दबाज़ी में कार्य कर रहा है और इससे लाखों मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। इस बात को बीजेपी ने भी आंतरिक स्तर पर स्वीकारा है कि आयोग के अचानक फैसले से उनका संगठन तैयार नहीं था।

विपक्ष ने खासतौर पर यह मुद्दा उठाया कि आवेदन करने के बाद भी वोटर्स को रसीद या acknowledgment नहीं मिल रहा, जिससे उन्हें संदेह हो रहा है कि उनकी एंट्री सिस्टम में दर्ज भी हुई या नहीं।

BLA नेटवर्क को सक्रिय करने पर ज़ोर

बीजेपी ने इस परिस्थिति से निपटने के लिए अपने बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) को फिर से सक्रिय करने की रणनीति अपनाई है। पार्टी ने 19 जुलाई से 31 जुलाई के बीच राज्य के सभी विधानसभा क्षेत्रों में SIR को लेकर जनसंवाद कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया है, ताकि मतदाताओं की प्रतिक्रिया और आशंकाएं समझी जा सकें।

भीखू भाई दलसानिया ने कहा कि हर BLA को अधिक से अधिक बूथों का दौरा करना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी समर्थक मतदाता सही तरीके से सूची में बने रहें।

70–80% फॉर्म बिना दस्तावेजों के जमा

सूत्रों के मुताबिक, अब तक जो फॉर्म जमा हुए हैं उनमें से 70-80 प्रतिशत में कोई आवासीय प्रमाण नहीं जोड़ा गया है। जबकि चुनाव आयोग ने 11 प्रकार के दस्तावेजों की सूची जारी की थी जो वैध प्रमाण माने जाएंगे। यह मुद्दा बीजेपी के लिए और चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि फॉर्म रिजेक्ट होने की आशंका के चलते वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम कट सकते हैं।

BJP प्रवक्ता का बयान – समर्थन भी, चिंता भी

इस बीच बीजेपी प्रवक्ता ने SIR प्रक्रिया का समर्थन करते हुए कहा है कि वे चाहते हैं कि हर वैध वोटर लिस्ट में बना रहे, लेकिन उन्होंने यह भी माना कि कुछ वोटर्स—खासकर वे जो कामकाज के सिलसिले में राज्य से बाहर गए हैं,—उनका नाम लिस्ट से हट सकता है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि चुनाव आयोग का ऑनलाइन ऐप इन समस्याओं को दूर करने में मददगार साबित होगा।

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बिहार में मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया ने राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है। विपक्ष जहां इसे ‘मताधिकार छीनने की साजिश’ बता रहा है, वहीं बीजेपी भी संगठनिक ढांचे को मज़बूत करने और मतदाताओं की नाराज़गी को दूर करने में जुट गई है। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि SIR प्रक्रिया किस पार्टी को नुकसान पहुंचाएगी और किसे इसका लाभ मिलेगा।

ग्वालियर में ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने खुद उठाया फावड़ा, नाली की सफाई कर अफसरों को दी सख्त चेतावनी

ग्वालियर मध्य प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर एक बार फिर अपनी ज़मीन से जुड़ी कार्यशैली के लिए चर्चा में हैं। रविवार को ग्वालियर के वार्ड क्रमांक 16 के रेशम मील क्षेत्र में बिना किसी पूर्व सूचना के निरीक्षण पर पहुंचे मंत्री तोमर ने इलाके में गंदगी और जलभराव की शिकायतें मिलने पर खुद ही फावड़ा उठाया और नाली की सफाई में जुट गए। इसके बाद उन्होंने मौके पर मौजूद नगर निगम अधिकारियों को कड़ी फटकार भी लगाई।

बिना लाव-लश्कर के पहुंचे मंत्री, खुद संभाला मोर्चा

स्थानीय लोगों की शिकायतों के आधार पर मंत्री तोमर अचानक ही रेशम मील क्षेत्र पहुंचे। जब उन्होंने वहां की खस्ताहाल नालियों और भरे हुए गंदे पानी की स्थिति देखी, तो बिना कुछ कहे खुद फावड़ा थाम लिया और सफाई शुरू कर दी। उन्होंने स्थानीय लोगों को भी सफाई के लिए आगे बुलाया और प्रशासन को एक सीधा संदेश दिया— “अगर अधिकारी लापरवाह हैं, तो जनता के बीच उतरकर काम करना ही पड़ेगा।”

अधिकारियों को चेतावनी – अब मैदान में दिखेगी जवाबदेही

सफाई के बाद मंत्री तोमर ने नगर निगम के अधिकारियों को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा,

“जनता को मूलभूत सुविधाएं देना हमारी प्राथमिकता है। स्वच्छता में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि अगली बार ऐसी स्थिति दोबारा मिली तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी।”

जनसम्पर्क के दौरान मिलीं कई शिकायतें, तत्काल दिए निर्देश

रेशम मील क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए मंत्री तोमर ने वार्ड के अन्य इलाकों में भी जनसम्पर्क किया। यहां लोगों ने पेयजल सप्लाई, सीवर लाइन, स्ट्रीट लाइट, और सड़क मरम्मत से जुड़ी समस्याएं उठाईं। मंत्री ने मौके पर मौजूद अधिकारियों को तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए और कई शिकायतों के समाधान के लिए 3 से 7 दिन की समय-सीमा तय की।

पहले भी दिख चुका है ‘मैदान में मंत्री’ वाला अंदाज

यह पहला मौका नहीं है जब प्रद्युम्न सिंह तोमर ने सफाई अभियान में खुद भाग लिया हो। इससे पहले भी वे नालियों की सफाई, झाड़ू लगाने और कचरा हटाने जैसे कार्यों में खुद सक्रिय रूप से भाग ले चुके हैं। मंत्री तोमर की यह शैली न केवल जनता के साथ सीधा जुड़ाव बनाती है, बल्कि प्रशासनिक मशीनरी को भी जवाबदेह और सतर्क बनाती है।

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नेतृत्व मैदान से दिखता है

प्रद्युम्न सिंह तोमर का यह ताजा निरीक्षण एक बार फिर यह साबित करता है कि सच्चा नेतृत्व सिर्फ दफ्तरों में बैठकर नहीं, बल्कि मैदान में उतरकर समस्याएं हल करने से होता है। जहां एक ओर जनता को राहत मिलती है, वहीं अधिकारी भी सतर्क हो जाते हैं कि मंत्री कभी भी निरीक्षण पर आ सकते हैं।

मध्य प्रदेश में पंडितों को मिलेगी सरकारी नौकरी! सरकार की बड़ी पहल, पुजारियों की होगी भर्ती

मध्य प्रदेश सरकार धार्मिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने और धार्मिक स्थलों को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच मोहन सरकार ने प्रदेश के मंदिरों में सरकारी स्तर पर पुजारियों की नियुक्ति की योजना पर काम शुरू कर दिया है। इस योजना के तहत उज्जैन गुरुकुल से दीक्षित पंडितों को प्राथमिकता दी जाएगी। शुरूआती चरण में 5000 से अधिक पुजारियों की भर्ती की जाएगी। साथ ही मानदेय (वेतन) बढ़ाने की भी तैयारी है।

शासन के अधीन मंदिरों में होंगे पुजारी नियुक्त

धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग ने प्रदेशभर के ऐसे मंदिरों, मठों, धर्मशालाओं की सूची मांगी है जो शासन के अधीन या जिनके ट्रस्टी स्थानीय कलेक्टर हैं। इनमें से कई जगहों पर पुजारियों के पद रिक्त हैं, जहां अब योग्य और प्रशिक्षित पुजारियों की नियुक्ति की जाएगी।

खंडवा जिले से मिली जानकारी के मुताबिक जिले में 249 मंदिर चिह्नित किए गए हैं। इनमें 152 में पुजारी कार्यरत हैं जबकि 97 पद रिक्त हैं। अकेले ओंकारेश्वर में 32 मंदिर हैं, जिनमें से सिर्फ 13 में पुजारी हैं। शेष 19 मंदिरों में भी अब नियुक्तियां की जाएंगी।

कौन होंगे पात्र पंडित?

सरकार ने नियुक्ति के लिए धार्मिक योग्यता की शर्त निर्धारित की है। केवल वे ही पुजारी पात्र होंगे जो उज्जैन स्थित गुरुकुल से दीक्षा प्राप्त हैं। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि नियुक्त पंडित धार्मिक आचरण, वेद-पाठ और पूजा विधि में पारंगत हों।

इन नियुक्तियों की प्रक्रिया एसडीएम स्तर पर की जाएगी ताकि पूरी पारदर्शिता बनी रहे। संबंधित अधिकारी आवेदन, साक्षात्कार और चयन का जिम्मा संभालेंगे।

मंदिरों की जमीन और आय की होगी निगरानी

धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग ने कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि वे मंदिरों की संपत्ति, पुजारियों की स्थिति, मंदिर समितियों की जानकारी, अतिक्रमण और न्यायालयीन मामलों की रिपोर्ट जल्द सौंपें। प्रदेशभर में करीब 20,000 से अधिक मंदिरों का डेटा विभाग के पास पंजीकृत है।

पुजारियों को मिलेगा नियमित मानदेय

सरकार ने यह भी संकेत दिए हैं कि नियुक्त पुजारियों को अब मानदेय के रूप में नियमित और सम्मानजनक वेतन मिलेगा। अब तक जो पुजारी स्वैच्छिक सेवा कर रहे थे या ट्रस्ट के भरोसे काम कर रहे थे, उन्हें अब एक निश्चित आर्थिक स्थायित्व मिलेगा।

सरकारी स्तर पर मंदिरों की निगरानी

सरकार की इस योजना का उद्देश्य न सिर्फ धार्मिक व्यवस्था को सुधारना है, बल्कि मंदिरों की संपत्तियों की सुरक्षा, पूजा-पाठ की नियमितता और धार्मिक रीति-रिवाजों की शुद्धता सुनिश्चित करना भी है। विभाग के मुताबिक कई मंदिरों की जमीन पर अवैध कब्जे और कोर्ट केस चल रहे हैं। पुजारियों की सरकारी नियुक्ति से इन समस्याओं के समाधान की भी उम्मीद की जा रही है।

क्या बोले अधिकारी?

अंशु जावला, प्रभारी अधिकारी, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग एवं संयुक्त कलेक्टर ने बताया,

“शासन की मंशा धार्मिक स्थलों को व्यवस्थित करने की है। मंदिरों का ब्यौरा इकट्ठा कर लिया गया है। जिन मंदिरों में पुजारी नहीं हैं वहां नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया जल्द शुरू होगी।”

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मध्य प्रदेश सरकार की यह पहल एक तरफ जहां धार्मिक व्यवस्था को सुदृढ़ करेगी, वहीं हजारों युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। यह योजना परंपरा और प्रशासन का सुंदर मेल है, जो आने वाले सिंहस्थ-2028 से पहले प्रदेश की धार्मिक छवि को मजबूत करने में सहायक हो सकती है।