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बैगा परिवार पर जमीन विवाद को लेकर हमला, स्थगन आदेश के बावजूद गुप्ता परिवार ने की मारपीट – पुलिस पर FIR न लेने का आरोप

सीधी, मझौली तहसील।
जिले के मड़वास थाना क्षेत्र के ग्राम बनिया टोला में जमीन विवाद को लेकर बैगा जनजाति के कई परिवारों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ितों ने कलेक्टर और अजाक थाने में दिए आवेदन में बताया कि स्थगन आदेश के बावजूद दबंगों ने उनके घर में घुसकर गालियां, मारपीट और महिलाओं से अभद्रता की। इतना ही नहीं, पुलिस पर FIR दर्ज न करने का आरोप भी लगाया गया है।

क्या है पूरा मामला?

पीड़ित जयलाल बैगा, लक्ष्यमणि बैगा, राजबहोर बैगा, शिवबहोर बैगा, रामकुमार बैगा, पूनम बैगा, रामखेलावन बैगा, गेंदलाल, सुरेश, शिवनंदन, बेलाकली बैगा, पार्वती बैगा, पिंकी बैगा और फूलमति बैगा सहित अन्य लोगों ने बताया कि वे ग्राम बनिया टोला के आराजी नंबर 127/2, रकवा 0.0430 हेक्टेयर भूमि पर वर्षों से मकान बनाकर निवास कर रहे हैं।

पीड़ितों का आरोप है कि गुरुवार 11 जुलाई को दोपहर करीब 2 बजे सोनू गुप्ता, कमलेश गुप्ता, अयोध्या गुप्ता, राजेश गुप्ता, रामसखा गुप्ता, संजीव गुप्ता और उनके अन्य साथी अचानक हथियारनुमा डंडों के साथ मौके पर पहुंचे। बाड़ी तोड़ते हुए सीधे घर के अंदर घुस आए और महिलाओं को गालियां देते हुए उनके साथ मारपीट करने लगे। महिलाओं द्वारा विरोध किए जाने पर उन्हें धक्का देकर गिराया गया और अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया।

घटना के दौरान हल्ला सुनकर जब घर के पुरुष सदस्य मौके पर पहुंचे तो उन्हें भी बेरहमी से पीटा गया। मारपीट में कई लोगों को चोटें आई हैं। जब आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे तो आरोपी पक्ष जमीन खाली करने की धमकी देते हुए वहां से फरार हो गया।

पुलिस पर लगे गंभीर आरोप

घटना के तुरंत बाद पीड़ित परिवार मड़वास थाना पहुंचा, लेकिन उनका आरोप है कि पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की। असहाय बैगा परिवार ने कहा कि थाने में उन्हें भगा दिया गया, जिसके बाद वे सीधी मुख्यालय पहुंचे और कलेक्टर व अजाक थाने में आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई है।

क्या है न्यायालय का आदेश?

पीड़ित जयलाल बैगा ने बताया कि जिस जमीन पर विवाद है, उसी पर एसडीएम मझौली न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने का स्थगन आदेश दिया हुआ है।
राजस्व प्रकरण क्रमांक 0020/अ-70/2024-25 पर आदेश दिनांक 4 जून 2025 को जारी हुआ, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि

“ग्राम बनिया टोला की आराजी नंबर 127/2 रकवा 0.0430 हेक्टेयर भूमि में यथास्थिति कायम रखी जाए और दोनों पक्ष इस आदेश का पालन करें।”

इसके बावजूद गुप्ता परिवार द्वारा जबरन कब्जे की कोशिश और हमला, न्यायालय के आदेश की खुलेआम अवहेलना है।

पीड़ितों की मांग

बैगा परिवार का कहना है कि वे अनुसूचित जनजाति से हैं और उन्हें लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है
उन्होंने जिला प्रशासन से दोषियों पर SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार करने की मांग की है।
इसके साथ ही स्थगन आदेश का उल्लंघन करने पर अवमानना की कार्यवाही की भी मांग की गई है।

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अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और पुलिस इस मामले में कब तक कार्रवाई करती है।
एक तरफ पीड़ितों के पास न्यायालय का स्पष्ट स्थगन आदेश, दूसरी ओर खुलेआम हमला और FIR से इनकार — यह प्रशासनिक तंत्र की गंभीर विफलता को उजागर करता है।

यह मामला न केवल आदिवासी अधिकारों, बल्कि न्याय व्यवस्था और प्रशासन की संवेदनशीलता की भी अग्निपरीक्षा बन चुका है।

“मुझे एक तस्वीर दिखा दीजिए जिसमें भारत को नुकसान हुआ हो” — NSA डोभाल का ऑपरेशन सिंदूर पर बड़ा बयान

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल ने एक बार फिर अपनी स्पष्टता और रणनीतिक सोच का परिचय देते हुए IIT मद्रास में छात्रों और विशेषज्ञों के सामने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस ऑपरेशन में भारत को कोई नुकसान नहीं हुआ, और विदेशी मीडिया द्वारा चलाई गई झूठी रिपोर्ट्स सिर्फ एक प्रोपेगेंडा का हिस्सा थीं।

“एक गिलास भी नहीं टूटा” — डोभाल का दावा

डोभाल ने कहा,

“मुझे एक भी तस्वीर दिखाइए जिसमें भारत को नुकसान हुआ हो। यहां तक कि एक गिलास भी नहीं टूटा।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान और उसके बाद भारत की सैन्य क्षमताएं पूरी तरह प्रभावी रहीं और कोई भी टारगेट मिस नहीं हुआ।

Op Sindoor: भारत की जवाबी कार्रवाई

6 और 7 मई की दरम्यानी रात, भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च किया।
यह ऑपरेशन उस समय आया जब 22 अप्रैल को पहाalgam में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ, और पाकिस्तान लगातार LOC पर शेलिंग कर रहा था।

भारतीय सेनाओं ने PoJK और पाकिस्तान में 9 ठिकानों को निशाना बनाया।
इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के लॉन्च पैड्स और ट्रेनिंग कैंप शामिल थे।
इस ऑपरेशन में करीब 100 आतंकियों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है।

विदेशी मीडिया पर डोभाल का हमला

NSA डोभाल ने सीधे विदेशी मीडिया पर निशाना साधते हुए कहा कि

“कुछ थिंक टैंक्स और मीडिया हाउसेज ने भारत के खिलाफ झूठी खबरें फैलाने की कोशिश की।”
उन्होंने दावा किया कि भारत के जेट डाउन होने, नुकसान या एयरबेस पर हमले की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, लेकिन आज तक कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं किया गया।

डोभाल ने यह भी कहा कि यदि कोई दावा करता है कि भारत को नुकसान हुआ, तो उसे

“10 मई से पहले और बाद की सैटेलाइट इमेजेज दिखानी चाहिए, ताकि सच खुद सामने आ सके।”

तकनीक और वॉरफेयर का तालमेल

डोभाल ने कहा कि आज के युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, टेक्नोलॉजी से जीते जाते हैं। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में स्वदेशी तकनीक का पूरा इस्तेमाल किया गया और सभी हमले सटीक थे।

उन्होंने कहा:

“हमें ऑपरेशन सिंदूर पर गर्व है। हमने सीमापार जाकर हमला किया और सभी टारगेट्स पर सटीक प्रहार किया। यह युद्ध नहीं, पर रणनीतिक संदेश था।”

100 घंटे की तनातनी और अंत में सीजफायर

ऑपरेशन सिंदूर के बाद करीब 100 घंटे तक भारत और पाकिस्तान के बीच भारी गोलीबारी और ड्रोन हमले होते रहे।
10 मई को शाम 3:35 बजे, DGMO स्तर की बातचीत के बाद सीजफायर पर सहमति बनी। यह स्पष्ट था कि भारत का जवाब इतना सटीक और व्यापक था कि पाकिस्तान रणनीतिक रूप से पीछे हटने पर मजबूर हुआ।

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अजित डोभाल का यह बयान सिर्फ एक रणनीतिक सफलता की पुष्टि नहीं करता, बल्कि यह भी बताता है कि आज भारत न केवल सैन्य रूप से सशक्त, बल्कि सूचना युद्ध (Information Warfare) में भी तैयार है।
जहां विदेशी मीडिया और विरोधी देश झूठ फैलाकर भारत की छवि खराब करना चाहते हैं, वहीं भारत अब अपनी सटीक कार्रवाई और पारदर्शिता से जवाब देने में सक्षम है।

डोभाल का यह बयान एक संकेत है — नया भारत अब चुप नहीं बैठता, जवाब देता है… और सटीक देता है।

40 साल बाद मिला ‘न्याय’, 90 साल के बुजुर्ग को हाईकोर्ट ने दी राहत

दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक पुराने और लंबित पड़े केस में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 90 वर्षीय बुजुर्ग को बड़ी राहत दी है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन साल की सजा को घटाकर “एक दिन” कर दिया, और वह भी पहले से जेल में बिताए समय के आधार पर। इस फैसले के पीछे अदालत की मुख्य सोच रही — उम्र, सेहत और ‘तुरंत न्याय’ के संवैधानिक अधिकार का हनन

क्या था मामला?

यह कहानी है साल 1984 की। सुरेंद्र कुमार, जो उस समय स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (STC) में चीफ मार्केटिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत थे, पर आरोप लगा कि उन्होंने मुंबई की एक फर्म से 15,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। यह रिश्वत 140 टन ड्राई फिश के सप्लाई टेंडर को पास करने के एवज में थी।

जब शिकायतकर्ता अब्दुल करीम हमीद ने CBI को इसकी सूचना दी, तो सुरेंद्र कुमार को एक होटल में रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा गया। गिरफ्तार होने के अगले ही दिन उन्हें जमानत मिल गई थी।

19 साल बाद मिली सजा, फिर 22 साल तक लटका रहा केस

साल 2002 में, करीब 19 साल की लंबी सुनवाई के बाद, निचली अदालत ने सुरेंद्र कुमार को दो साल की कैद और 15,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। सुरेंद्र कुमार ने उसी साल इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन उनकी अपील अगले 22 साल तक पेंडिंग रही।

और तब तक, उम्र बीतती गई। सुरेंद्र कुमार आज 90 साल के हैं, बीमार हैं, बिस्तर पर हैं और एक कमजोर शरीर के साथ अदालत की राहत का इंतज़ार कर रहे थे।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

8 जुलाई 2025 को जस्टिस जसमीत सिंह की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए साफ कहा:

“यह मामला भारत के संविधान में दिए गए ‘तुरंत न्याय’ के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। जब कोई इंसान 40 साल तक न्याय की तलवार के नीचे जीता है, तो यह खुद में एक गंभीर सज़ा है।”

क्यों दी गई राहत?

सुरेंद्र कुमार के वकील ने बताया कि:

  • उनकी उम्र 90 वर्ष है।
  • वे कई बीमारियों से जूझ रहे हैं और अधिकतर समय बिस्तर पर रहते हैं।
  • उन्होंने ट्रायल में पूरी तरह सहयोग किया और कोई शर्त नहीं तोड़ी।
  • जुर्माना पहले ही भर दिया गया है।

CBI ने भी अदालत में यह स्वीकार किया कि अदालत को सजा कम करने का अधिकार है, खासकर जब आरोपी की उम्र और स्वास्थ्य बेहद खराब हो।

इन सबको ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सजा को घटाकर यह कहा:

“जितना समय पहले जेल में बिताया गया है, वही सजा पर्याप्त है।”

एक बड़ी नजीर

यह फैसला ना सिर्फ सुरेंद्र कुमार के लिए राहत लेकर आया, बल्कि देश के न्याय तंत्र पर भी सवाल खड़े करता है। जब एक मामला 40 साल तक न सुलझे, तो सवाल उठना लाज़मी है – क्या हमारी न्याय व्यवस्था समय पर इंसाफ देने में सक्षम है?

इस फैसले ने यह भी दिखा दिया कि अदालतें परिस्थितियों को समझकर, मानवता के आधार पर भी निर्णय दे सकती हैं। यह उन तमाम बुजुर्गों, बीमारों और सालों से लंबित मामलों के शिकार लोगों के लिए एक किरण बनकर सामने आया है

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भ्रष्टाचार का आरोप हो या कोई गंभीर अपराध – कानून को अपना काम करना चाहिए। लेकिन जब न्याय में देरी, खुद अन्याय बन जाए, तो उसके समाधान के लिए संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण ज़रूरी हो जाता है। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला कठोर नहीं, करुणामयी न्याय की मिसाल बनकर सामने आया है।

MP High Court:- 7 साल बाद भी नियुक्ति न देने पर नायब तहसीलदार मामले में फटकार, अधिकारी से वसूला जाएगा हर्जाना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एक बेहद अहम फैसले में राज्य शासन और राजस्व विभाग के अधिकारियों को फटकार लगाई है, जहां एक अभ्यर्थी को नायब तहसीलदार के पद पर चयन के बाद भी सात साल तक नियुक्ति नहीं दी गई। कोर्ट ने इसे “मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और निरंकुश” रवैया करार देते हुए याचिकाकर्ता को 30 दिन के भीतर पोस्टिंग देने और 7 लाख रुपये हर्जाने की सिफारिश की है। खास बात ये है कि ये हर्जाना उस अधिकारी से वसूला जाएगा, जिसने लापरवाही की।

मामला क्या है?

कांच मिल रोड, ग्वालियर निवासी अतिराज सेंगर ने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) द्वारा वर्ष 2013 में आयोजित तहसीलदार भर्ती परीक्षा में भाग लिया था। वर्ष 2016 में इसका परिणाम घोषित हुआ, जिसमें अतिराज को सामान्य श्रेणी (श्रवण बाधित) की प्रतीक्षा सूची में 16वें नंबर पर रखा गया। इस श्रेणी में चयनित केवल एक उम्मीदवार, अमित कुमार तिवारी, ने पदभार ग्रहण नहीं किया। इसके बाद MPPSC ने 2018 में अतिराज सेंगर के नाम की अनुशंसा की।

लेकिन यहाँ से शुरू हुई नौकरशाही की लापरवाही। राजस्व विभाग को 2018 में अनुशंसा मिलने के बावजूद न तो कोई जवाब दिया गया, न ही नियुक्ति पत्र भेजा गया। आखिरकार अतिराज को न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा

राज्य शासन का बचाव और कोर्ट की टिप्पणी

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि चयन सूची की वैधता एक वर्ष तक ही थी, और MPPSC ने परिणाम घोषित होने के एक साल बाद अनुशंसा भेजी, जब सूची “अस्तित्व में नहीं” थी। अतः नियुक्ति संभव नहीं।

लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा:

“यह राज्य शासन के अधिकारियों की मनमानी और दुर्भावना का स्पष्ट उदाहरण है। जब MPPSC ने विधिवत अनुशंसा की थी, तो उस पर कार्रवाई करना विभाग की जिम्मेदारी थी।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि “याचिकाकर्ता के जीवन के 7 वर्ष इस प्रक्रिया ने बर्बाद कर दिए। वह अपनी सफलता का आनंद नहीं ले सका।” कोर्ट ने राज्य शासन को आदेश दिया कि 30 दिन में याचिकाकर्ता की नियुक्ति दी जाए, और ₹7 लाख की क्षतिपूर्ति उस अधिकारी से वसूल की जाए, जिसने नियुक्ति में अड़ंगा डाला।

क्यों है यह फैसला अहम?

यह फैसला मध्य प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र में सिस्टमेटिक लापरवाही और जवाबदेही के अभाव को उजागर करता है। जब एक अभ्यर्थी चयन के बावजूद 7 साल तक नियुक्ति की राह देखता है, तो सवाल उठते हैं – क्या केवल सत्ता और पद ही सिस्टम का हिस्सा हैं? क्या आम युवाओं की उम्मीदों की कोई कीमत नहीं?

इस फैसले ने न सिर्फ याचिकाकर्ता को न्याय दिलाया है, बल्कि पूरे सिस्टम को चेतावनी भी दी है कि अब लापरवाही की कीमत देनी पड़ेगी

ग्वालियर हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि न्याय में देरी भी अन्याय है। अतिराज सेंगर को आखिरकार न्याय मिला, लेकिन 7 साल की मानसिक और व्यावसायिक यातना के बाद। अब देखना यह होगा कि राज्य शासन इस आदेश का ईमानदारी से पालन करता है या फिर अपील की आड़ में फिर से देरी का खेल खेलता है

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यह मामला उन हजारों युवाओं के लिए एक उम्मीद बन सकता है, जो व्यवस्था की बेरुखी से जूझ रहे हैं। अदालत का यह संदेश साफ है – अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।

गुरुग्राम की सड़क ने पी ली बीयर! बारिश के बाद धंसी सदर्न पेरिफेरल रोड, बीयर से लदा ट्रक समाया गड्ढे में

क्या इंजीनियरिंग की चूक, बारिश की मार या लापरवाही का नतीजा?

गुरुग्राम में एक बार फिर बारिश ने सिस्टम की असलियत उजागर कर दी है। 9 जुलाई की रात शहर की व्यस्त सदर्न पेरिफेरल रोड अचानक धंस गई, और इस हादसे में एक बीयर से लदा ट्रक सीधे गड्ढे में समा गया। गनीमत रही कि हादसे में कोई जख्मी नहीं हुआ, लेकिन जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए, उन्होंने प्रशासन और इंजीनियरिंग की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हादसा कैसे हुआ?

यह हादसा रात 10 से 11 बजे के बीच का है। जब गुरुग्राम में तेज बारिश के चलते कई हिस्सों में जलभराव की स्थिति बन गई थी। सदर्न पेरिफेरल रोड से गुजर रहा एक ट्रक, जिसमें हजारों लीटर बीयर की बोतलें लदी थीं, अचानक धंसी सड़क के साथ गड्ढे में जा गिरा। ड्राइवर ने बताया कि घटना के समय रोड पूरी तरह सूखी थी और उससे पहले दो अन्य भारी वाहन भी उसी रास्ते से गुजर चुके थे।

सीवर पाइपलाइन बना कारण?

अधिकारियों ने बताया कि सड़क के नीचे हाल ही में सीवर पाइपलाइन डाली गई थी, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में जलभराव की समस्या को हल करना था। लेकिन पाइपलाइन बिछाने के महज 15 दिन बाद ही यह हादसा हो गया। बारिश के पानी और पहले की खुदाई के कारण सड़क की नींव कमजोर हो गई थी, जिससे ये गड्ढा बना।

ड्राइवर का बयान

“मैं गोदाम जा रहा था। ट्रक में बीयर की बोतलें थीं। जैसे ही मैं इस रोड से गुजरा, ट्रक धंस गया। यहां कोई पानी नहीं था, सब ठीक लग रहा था। अगर दिन का समय होता तो हादसा और बड़ा हो सकता था।”

गुरुग्राम की सड़कों की पुरानी कहानी

ये कोई पहला मौका नहीं है जब गुरुग्राम की सड़कों ने बारिश में दम तोड़ा हो। हर साल बारिश के मौसम में NH-8, सोहना रोड, MG रोड, नरसिंहपुर जैसे इलाकों में जलभराव आम हो चुका है। गाड़ियां तैरती हैं, ऑफिस जाने वाले घंटों जाम में फंसते हैं और प्रशासन केवल बयान देकर बच निकलता है।

इस बार हालात और भी खराब रहे। IMD के अनुसार, 9 जुलाई की रात सिर्फ 90 मिनट में 103 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो पिछले कई सालों की तुलना में बेहद अधिक है। कुल मिलाकर शहर में 12 घंटे में 133 मिमी बारिश हुई। पास के वजीराबाद में भी 122 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई।

सवालों के घेरे में प्रशासन

अब सवाल उठ रहे हैं – क्या पाइपलाइन डालने के बाद रोड की मजबूती की जांच की गई थी? क्या इंजीनियरिंग में कोई चूक हुई? अगर यह रोड इतनी कमजोर थी तो भारी वाहनों का संचालन क्यों किया गया?

स्थानीय नागरिकों और शहरी नियोजन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि गुरुग्राम जैसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का हिस्सा रहे शहर में ऐसी घटनाएं विश्वासघात की तरह हैं। जब करोड़ों रुपये की लागत से सड़क बनाई जाती है, तो महज 15 दिन में उसका धंस जाना सिर्फ भ्रष्टाचार और लापरवाही का नतीजा माना जाएगा।

सोशल मीडिया पर उड़ा मजाक

इस हादसे का वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो लोगों ने गंभीर सवालों के साथ मजाक भी उड़ाया। किसी ने कहा, “सड़क ने बीयर पी ली!”, तो किसी ने लिखा – “गुरुग्राम की सड़कों में ड्रेन नहीं, ड्रिंक बह रही है।”

आगे क्या?

प्रशासन की ओर से कहा गया है कि जांच की जाएगी और जरूरत पड़ी तो डिज़ाइन में बदलाव भी किया जाएगा। मगर सवाल ये है कि हर बार हादसे के बाद ही जागने वाले सिस्टम को पहले से चेतावनी क्यों नहीं दिखती? क्या ऐसी घटनाएं सिर्फ मीडिया की सुर्खियां बनकर रह जाएंगी या कभी कोई जवाबदेही तय होगी?

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सड़क पर धंसा ट्रक सिर्फ एक हादसा नहीं, ये एक डूबते सिस्टम की पहचान है। गुरुग्राम जैसे विकसित शहर में जब बुनियादी संरचना इतनी असुरक्षित हो, तो आने वाला कल कैसा होगा? बीयर की बोतलों के साथ जो रोड धंसी, क्या उसमें भविष्य की उम्मीदें भी दब गईं?

ये हादसा एक चेतावनी है, सवाल ये है कि क्या कोई सुनेगा?

बरिगमा की जलभराव सड़क बनी मासूमों के लिए मौत का रास्ता, प्रशासन अब जागने की बात कर रहा है

सीधी, मध्य प्रदेश।
जनपद पंचायत सीधी के ग्राम बरिगमा में बारिश के चलते सड़कें नदी में तब्दील हो चुकी हैं। हालात इतने खराब हैं कि स्कूल जाने वाले मासूम बच्चों की जान पर हर दिन खतरा मंडरा रहा है। सबसे चिंता की बात यह है कि यह समस्या आज की नहीं, बल्कि तीन साल पुरानी है, लेकिन अब तक प्रशासन की नींद नहीं टूटी

गांव के आठ वर्षीय बालक सैश पटेल की बात ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी –

“हम रोज इसी रास्ते से स्कूल जाते हैं, कई बार गिर चुका हूं, मेरी किताबें और कपड़े भीग जाते हैं…”

ऐसे मासूम शब्द उस सड़ियल सिस्टम पर तमाचा हैं, जहां सड़क की जगह तालाब, और प्रशासन की जगह सन्नाटा है।

तीन साल से अधूरी नाली, हर साल डूबता गांव

गांव के ही राजा राम प्रजापति ने बताया कि ग्राम पंचायत ने करीब तीन साल पहले नाली निर्माण का कार्य शुरू किया, लेकिन काम अधूरा छोड़ दिया गया। तब से हर बारिश में हालात ऐसे हो जाते हैं कि पैदल निकलना तो दूर, जान जोखिम में डालकर भी चलना मुश्किल हो जाता है।

“हर साल कोई न कोई हादसा होता है, लेकिन जिम्मेदार लोग आंख मूंदे बैठे हैं।”

वर्षा जलभराव की वजह से ग्रामीणों को चोटें लग चुकी हैं, लेकिन न पंचायत ने सुध ली और न जिला प्रशासन ने।

बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़?

सबसे खौफनाक पहलू ये है कि प्राइमरी और मिडिल स्कूल जाने वाले बच्चे इसी रास्ते से गुजरते हैं। रोज कीचड़, फिसलन और पानी से जूझते हैं। कोई भी बड़ा हादसा हो सकता है, लेकिन न कोई पुलिया बनी, न पक्की सड़क, न वैकल्पिक रास्ता।

प्रशासन की प्रतिक्रिया – “अब पता चला”

जब मीडिया ने इस मुद्दे को उठाया, तब जनपद पंचायत सीधी के अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह परिहार ने कहा:

“अब हमें जानकारी मिली है। वरिष्ठ अधिकारियों की टीम भेजी जाएगी और जल्द समाधान होगा। बच्चों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है।”

सवाल यह है कि तीन साल से शिकायतें हो रही थीं, तब प्रशासन कहां था? क्या बच्चों की जान खतरे में डालने के बाद ही सिस्टम हरकत में आएगा?

उम्मीद बनाम हकीकत

ग्रामीणों को एक बार फिर उम्मीद है कि अब शायद प्रशासन नींद से जागेगा। लेकिन यह सवाल भी उतना ही जरूरी है –
क्या सिर्फ बयान देने से बच्चों को सुरक्षित रास्ता मिल जाएगा?
या फिर यह भी एक और “फॉलोअप के बिना” फाइलों में दबी शिकायत बनकर रह जाएगी?

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बरिगमा का ये मामला सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्थागत लापरवाही का चेहरा है, जो विकास के वादों के नीचे दबा है। जब तक प्रशासन सिर्फ बयानबाज़ी करता रहेगा और बच्चों को सुरक्षित रास्ता देने की बजाय बहाने देता रहेगा, तब तक हर बारिश में कोई न कोई मासूम इस गड्ढों भरे तंत्र की भेंट चढ़ता रहेगा।

“चुनाव से पहले क्यों?”, बिहार वोटर वेरिफिकेशन पर ECI से पूछा सवाल

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन को लेकर चुनाव आयोग (ECI) की पहल पर अब देश की सर्वोच्च अदालत ने सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया तर्कसंगत है, लेकिन इसका समय बेहद संवेदनशील है। अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि आखिर इतनी अहम प्रक्रिया चुनाव के कुछ ही महीने पहले क्यों शुरू की गई? क्या यह समय चुनाव को प्रभावित करने वाला नहीं है?

दरअसल, बिहार में वोटर लिस्ट की समीक्षा और नागरिकता सत्यापन को लेकर विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि आयोग का यह कदम मनमाना और भेदभावपूर्ण है, जो लाखों मतदाताओं को उनके वोटिंग अधिकार से वंचित कर सकता है।

कोर्ट ने कहा – “तर्कसंगत है प्रक्रिया, लेकिन टाइमिंग पर सवाल उठते हैं”

सुनवाई के दौरान जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने कहा:

“वोटर वेरिफिकेशन एक व्यावहारिक और संवैधानिक प्रक्रिया है। लेकिन सवाल है कि आपने इसे चुनाव से ऐन पहले क्यों शुरू किया? क्या यह पहले नहीं हो सकता था?”

कोर्ट ने आशंका जताई कि इस प्रक्रिया के कारण पहले से लिस्ट में मौजूद लाखों लोग भी अगर कुछ दस्तावेज नहीं दिखा पाए, तो मतदान से वंचित हो सकते हैं।

आधार नहीं चलेगा? कोर्ट ने खड़े किए सवाल

विवाद का बड़ा मुद्दा यह है कि वोटर की नागरिकता सिद्ध करने के लिए चुनाव आयोग ने जिन 11 दस्तावेजों को मान्यता दी है, उनमें आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड शामिल नहीं हैं।

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा,

“पूरा देश आधार के पीछे पागल हो रहा है, लेकिन चुनाव आयोग कहता है कि यह मान्य नहीं है। ये दोहरा रवैया क्यों?”

कोर्ट ने भी इस पर गंभीर सवाल उठाए। हालांकि, ECI के वकील ने तर्क दिया कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं होता, यह UIDAI के अनुसार सिर्फ पहचान है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मुद्दा गृह मंत्रालय का है, चुनाव आयोग का नहीं।

“कौन तय करेगा कौन नागरिक है?” – कपिल सिब्बल

याचिकाकर्ताओं की तरफ से कपिल सिब्बल ने भी मोर्चा संभाला। उन्होंने कहा,

“ECI कौन होता है यह कहने वाला कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं? इसका दायित्व राज्य का है, मतदाता का नहीं। आयोग के पास ऐसा कहने का कोई वैध आधार नहीं है।”

उन्होंने चेताया कि आयोग की प्रक्रिया 2003 के बाद मतदाता बने लोगों को हटा सकती है, भले ही उन्होंने 5 बार चुनाव में हिस्सा लिया हो।

चुनाव आयोग का पक्ष – “प्रक्रिया पूरी होने दीजिए”

ECI की तरफ से पेश हुए वकील ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि फिलहाल इस प्रक्रिया को रोका न जाए। उनका कहना था:

“हम यह सूची अंतिम रूप से प्रकाशित करने से पहले माननीय अदालत को दिखाएंगे। प्रक्रिया पारदर्शी है और इसमें किसी के अधिकार नहीं छीने जा रहे।”

क्या कहना है कोर्ट का?

कोर्ट ने प्रक्रिया पर रोक तो नहीं लगाई, लेकिन समय और आधार जैसे बिंदुओं पर आयोग को फिर से विचार करने की सलाह दी। अदालत ने साफ किया कि लोकतंत्र में मतदान का अधिकार सबसे बुनियादी अधिकारों में से एक है, और इससे खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।

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वोटर वेरिफिकेशन की जरूरत सभी को है, लेकिन चुनावी मौसम में इसे लागू करना सवालों के घेरे में है। साथ ही, आधार कार्ड को नकारना उस व्यवस्था को झटका दे सकता है, जो पूरे देश में डिजिटल पहचान की रीढ़ बन चुका है। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश और चुनाव आयोग की संभावित प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।

Z-शेप पर बवाल: इंदौर में बना ‘जिग-जैग’ पुल चुनावी बहस में तब्दील, सरकार और कांग्रेस आमने-सामने

भोपाल के 90 डिग्री पुल पर अभी सियासत थमी भी नहीं थी कि इंदौर से एक नया विवाद सामने आ गया है। पोलो ग्राउंड में बन रहा रेलवे ओवर ब्रिज इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है, और वजह है इसका अजीबोगरीब Z आकार का डिजाइन, जिसमें 90 डिग्री के दो तीखे मोड़ शामिल हैं। विपक्ष इसे ‘बर्बादी की योजना’ बता रहा है, तो सरकार इसे मानकों के अनुसार सुरक्षित निर्माण कह रही है।

क्या है पुल का मामला?

इंदौर के पोलो ग्राउंड से MR-4 की ओर बन रहा यह ओवरब्रिज दो मोड़ों के कारण चर्चा में है।
पहला मोड़ लक्ष्मीबाई नगर से भागीरथपुरा की ओर है, जबकि दूसरा मोड़ पोलोग्राउंड से MR-4 की ओर जाता है। इस अजीब डिजाइन को लेकर मध्य प्रदेश कांग्रेस ने सरकार को घेरा है।

कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप

मप्र कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस पुल को इंजीनियरिंग की विफलता बताते हुए कहा कि यह “बिना सोच-विचार के बनाई गई योजना है।”
उन्होंने इंदौर सांसद शंकर लालवानी, कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तुलसी सिलावट को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा:

“जनता से वोट लेकर नेता सो गए हैं। और इंदौर के नाम पर जो हो रहा है, वो शर्मनाक है। ये पुल विकास नहीं, दुर्घटनाओं का न्योता है।”

कांग्रेस के एक्स हैंडल से भी इस पुल को लेकर सवाल खड़े किए गए और PWD अधिकारियों पर “मनमानी प्लानिंग” का आरोप लगाया गया।

सरकार और इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट का जवाब

सरकार की ओर से सफाई में सबसे पहले लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह सामने आए। उन्होंने कहा कि:

“इस पुल का निर्माण पूरी तरह इंडियन रोड कांग्रेस (IRC) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हो रहा है। पाँच मोड़ों वाला ये पुल हर लिहाज़ से संतुलित और सुरक्षित है। सभी मोड़ों की रेडियस 20 मीटर के आसपास है, जबकि मानक 15 मीटर है।”

PWD की इंजीनियर गुरमीत कौर भाटिया ने मीडिया रिपोर्टों पर सवाल उठाते हुए कहा कि:

  • मीडिया में जो डिजाइन वायरल हो रहा है, वह सरकारी तौर पर फाइनल डिजाइन नहीं है।
  • काम अब भी प्रगति पर है और आधिकारिक रूप से मंजूर नक्शे के अनुसार ही किया जा रहा है।
  • अगर जरूरत पड़ी तो हाई लेवल रिव्यू किया जाएगा और सुधार की संभावनाएं तलाशी जाएंगी।

‘फर्जी डिजाइन’ या असली खतरा?

जन संपर्क विभाग ने भी इस विवाद पर एक्स (पूर्व ट्विटर) पर बयान जारी कर मीडिया में दिखाए जा रहे डिजाइन को फर्जी करार दिया है। लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकल अधिकारियों ने अब इस पर रिव्यू की बात कही है।

हालांकि, पुल निर्माण के बीच उठे ये सवाल कहीं न कहीं प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान तो लगाते हैं।

विपक्ष का तर्क बनाम सरकार की तकनीक

यह पूरा मुद्दा अब केवल एक पुल तक सीमित नहीं रहा।
यह चुनावी साल में भाजपा बनाम कांग्रेस की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। जहां एक ओर कांग्रेस इस पुल को लेकर सरकार की गंभीरता पर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा और सरकार इसे “विकास कार्य में खलल डालने की कोशिश” बता रही है।

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सवाल अब जनता का

  • क्या वाकई इस पुल का डिजाइन सुरक्षित है या फिर हादसों को न्योता देगा?
  • क्या वायरल हुआ Z-शेप नक्शा सिर्फ अफवाह है या सच्चाई छिपाई जा रही है?
  • और सबसे अहम — क्या इंदौर जैसे स्मार्ट सिटी में अब विकास बिना प्लानिंग के हो रहा है?

फिलहाल, मामला गर्म है और जनता, इंजीनियरिंग के फैसलों की नहीं, उनके असर की निगरानी कर रही है।

जब पुल मुड़ जाए, तो सवाल सीधा होता है — जिम्मेदार कौन?

बिहार बंद 2025: रेलवे थमा, ट्रेनों पर ब्रेक, 10 हजार करोड़ का नुकसान — चुनावी रणभूमि में सियासी महाभारत शुरू!

बिहार, जहां अब सियासत सिर्फ मंचों पर नहीं, सड़कों, रेलवे ट्रैकों और बाजारों तक उतर चुकी है। 9 जुलाई 2025, बुधवार की सुबह बिहार की जनता के लिए आम दिन जैसा नहीं था। महागठबंधन के बिहार बंद के आह्वान ने पूरे प्रदेश को जाम कर दिया, और सियासत की चिंगारी ने जनजीवन को झुलसा डाला।

हम बात कर रहे हैं उस बंद की, जो चुनाव आयोग के वोटर लिस्ट पुनरीक्षण यानी SIR के विरोध में बुलाया गया। लेकिन बंद का असर सिर्फ फॉर्म और मतदाता सूची तक सीमित नहीं रहा — इसका सबसे बड़ा निशाना बनीं आम जनता और रेलवे।

सियासत बनाम सिस्टम

राजनीतिक लिहाज से ये बंद उस समय आया जब बिहार में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। महागठबंधन का दावा है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में छेड़छाड़ कर रहा है, जिससे गरीब, दलित और पिछड़े तबकों को हटाया जा सके। और इसी आरोप को लेकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, राजद नेता तेजस्वी यादव, पप्पू यादव समेत कई दिग्गज सड़कों पर उतरे।

लेकिन सवाल यह भी है — इस विरोध की कीमत आखिर कौन चुका रहा है?

रेलवे की सांसें थमीं, यात्री बेहाल

इस बंद का सबसे सीधा असर रेल सेवा पर पड़ा।
पटना से लेकर दरभंगा, समस्तीपुर से सहरसा और मुजफ्फरपुर से बक्सर तक — रेल पटरी पर जनता नहीं, बल्कि सियासत दौड़ रही थी।

रेलवे के आंकड़ों पर नज़र डालें तो:

  • वंदे भारत एक्सप्रेस, संपर्क क्रांति, नमो भारत, गंगा सागर, श्रमजीवी, संगमित्रा, शहीद एक्सप्रेस समेत 12 प्रमुख ट्रेनें प्रभावित रहीं।
  • समस्तीपुर, दरभंगा, बिहिया, कपरपुरा जैसे स्टेशन बंद समर्थकों के निशाने पर रहे।
  • कई जगह ट्रेनें घंटों तक रोकी गईं, यात्रियों को बिना किसी सूचना के बीच रास्ते में फंसा दिया गया।

आर्थिक नुकसान का आंकड़ा चौंकाने वाला

बंद का असर सिर्फ ट्रेनों पर नहीं, बैंकिंग सेक्टर पर भी जबरदस्त रहा।
हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, बंद के कारण प्रदेशभर में करीब 10 हजार करोड़ रुपये का व्यापारिक नुकसान हुआ। ग्रामीण बैंक कर्मियों की हड़ताल ने ATM से लेकर चेक क्लियरेंस तक की व्यवस्था को ठप कर दिया।

आरोप-प्रत्यारोप का तूफान

बंद के बाद भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि यह कामचोरों की सियासत है।
डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने कहा:

“गांधी परिवार का राजकुमार और लालू यादव का वारिस — ये लोग लोकतंत्र में भरोसा नहीं करते।”

वहीं, राहुल गांधी का जवाब साफ था:

“बिहार की जनता के अधिकारों से छेड़छाड़ नहीं सहेगी। हम वोटरों की आवाज़ बनेंगे।”

जनता को मिला क्या?

ट्रेनों में फंसे यात्री
बैंक में लटकती ताले
स्कूल-कॉलेज बंद
दुकानों पर सन्नाटा
और इंटरनेट पर बिहार बंद ट्रेंड करता रहा।

बंद समर्थकों के इरादे सियासी हो सकते हैं, लेकिन नुकसान आम आदमी का हुआ है — और यह नुकसान सिर्फ पैसे का नहीं, भरोसे का भी है।

सवाल उठता है…

क्या लोकतंत्र में विरोध के नाम पर ट्रेनों को रोकना, मरीजों को अस्पताल तक न पहुंचने देना, या बच्चों की परीक्षाएं बिगाड़ देना जायज़ है?

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या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति है — जहां मुद्दा वोटर लिस्ट है, लेकिन टारगेट मीडिया हेडलाइन और जन सहानुभूति?

बिहार बंद ने चुनाव से पहले बिहार की राजनीतिक सच्चाई को बेपर्दा कर दिया है।
अब देखना यह है कि चुनाव आयोग इस दबाव का कैसे जवाब देता है, और क्या आने वाले चुनावों में मतदाता असली मुद्दों को पहचान पाएंगे?

आप हमारे साथ जुड़े रहें — क्योंकि बिहार की राजनीति अब सीधे पटरी पर आ गई है।

खुटार पशु बाजार में अवैध वसूली का खेल: सरकारी सिस्टम की चुप्पी या साज़िश?

सिंगरौली जिले के खुटार स्थित पशु बाजार में इन दिनों कुछ ऐसा घट रहा है, जिसे देखकर न केवल ग्रामीण हैरान हैं बल्कि प्रशासनिक चुप्पी पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय व्यापारियों और पशुपालकों के मुताबिक, बाजार में हर पशु पर ₹700 की वसूली की जा रही है — वह भी बिना किसी वैध सरकारी दस्तावेज़ या नियम के। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस वसूली में कुछ ऐसे नाम भी सामने आ रहे हैं, जो सीधे तौर पर सरकारी तंत्र से जुड़े हैं। क्या यह प्रशासन की लापरवाही है, या फिर कोई सोची-समझी मिलीभगत?

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यह वसूली नगर निगम की आड़ में की जा रही है, जबकि इस पर कोई वैध अनुमति नहीं है। पशुपालकों को जो रसीदें दी जा रही हैं, उनमें न तो कोई सरकारी मुहर है और न ही कोई रजिस्ट्रेशन कोड। सवाल यह है कि अगर यह वसूली कानूनी है, तो फिर यह सब कागज़ों में क्यों नहीं दर्शाया गया?

इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि दो नाम, मनोज (सरकारी शिक्षक) और राहुल शाह, इस वसूली के केंद्र में बताए जा रहे हैं। मनोज एक गवर्नमेंट स्कूल में अध्यापक हैं, लेकिन अब उन पर आरोप है कि वे या तो खुद इस वसूली में संलिप्त हैं या फिर पर्दे के पीछे से इसे संचालित कर रहे हैं। राहुल शाह का नाम भी इसी तरह से बार-बार सामने आ रहा है। क्या सरकारी पद पर बैठे ये लोग वास्तव में इस गोरखधंधे का हिस्सा हैं?

इस सवाल को और गंभीर बनाता है वह कबूलनामा, जो बाजार में रसीद काटने वाले एक व्यक्ति ने कैमरे पर दिया। उसने दावा किया कि उसे ये वसूली करने का निर्देश नगर निगम के एक अधिकारी ने दिया है और वह हर सप्ताह की रकम उन्हें सौंपता है। यदि यह बात सच है, तो मामला केवल एक स्थानीय घोटाले का नहीं, बल्कि उच्च स्तर तक फैले भ्रष्ट तंत्र का है।

स्थानीय व्यापारियों और ग्रामीणों का कहना है कि पहले भी यह अवैध वसूली सामने आ चुकी है और कुछ समय के लिए बंद भी हुई थी। लेकिन अब, जैसे ही प्रशासन की नजर हटी, यह गोरखधंधा फिर शुरू हो गया। सवाल यह है कि नगर निगम और प्रशासन कब तक आंखें मूंदे बैठे रहेंगे?

नगर निगम कमिश्नर डी.के. शर्मा ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि वसूली की अनुमति केवल नगर क्षेत्र में दी गई थी, ग्रामीण क्षेत्र में नहीं। उन्होंने अवैध वसूली की शिकायत मिलने के बाद ठेका निरस्त करने और जांच के आदेश देने की बात कही। महापौर रानी अग्रवाल ने कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं थी और वे इसकी समीक्षा करेंगी। वहीं नगर निगम अध्यक्ष देवेश पांडे ने कार्रवाई का आश्वासन देते हुए कहा कि यदि वीडियो और साक्ष्य दिए जाएं, तो वह निश्चित ही जांच करवाएंगे।

इस पूरे मामले में अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। क्या नगर निगम अपने वादों पर खरा उतरेगा? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाएगा?

एक और अहम बात — यह वसूली सिर्फ आर्थिक शोषण नहीं है, बल्कि ग्रामीणों की न्याय प्रणाली और विश्वास पर चोट है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ एक घोटाले की कहानी नहीं, बल्कि आने वाले समय में एक बड़े जन आंदोलन की चिंगारी बन सकता है।

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अब देखने वाली बात यह है कि क्या यह साज़िशन चुप्पी टूटेगी या फिर भ्रष्टाचार की यह दीवार और मजबूत होगी।